Monday, September 14, 2026

तेवरी काव्यधारा : उत्पत्ति, विकास और वैचारिकता

 तेवरी काव्यधारा : उत्पत्ति, विकास और वैचारिकता


+डॉ. चन्दन कुमारी

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 हिंदी साहित्य की काव्यधारा तेवरीशिथिलता में स्पंदन का स्वतःस्फूर्त संचार है | जमीनी हकीकत को बयां करने वाली इस कविता का मूल तत्व है ‘तेवर’ और इसमें गुंफित ओज की जननी है असंतोषजन्य ‘आक्रोश’ |यह आक्रोश, विनाश का नहीं वरन कचोटते मन की क्षुब्धता मिश्रित विरोध का द्योतक है | आहत क्रौंच पक्षी के जोड़े की असहयनीय वेदनायुक्त क्षुब्ध मनके भीतर छिपे आक्रोश वाले तेवर को महसूस करते हुए ‘विरोध रस’ के प्रतिष्ठापक रमेशराज ‘आक्रोश’ को विरोध का स्थायी भाव मानते हैं | उनके अनुसार “आक्रोश मनुष्य के मन की वह संवेगात्मक अवस्था है, जिसका रूप प्रतिवेद्नात्मक होता है | प्रतिवेदना अर्थात किसी भी घटना से असहमति जिसका प्रधान लक्षण है |.. अत्याचारी का कुछ न बिगाड पाने की विवशता आक्रोश को जन्म देती है | अपमान, उपहास, तिरस्कार की मार से तिलमिलाता मनुष्य भीतर ही भीतर घुटता है, क्षुब्ध होता है | मन ही मन उस व्यक्ति को कोसता है, श्राप देता है, जिसने उसके मन को चोट पहुंचाई है |”1आक्रोश आहत मन की पूंजी है | तेवरीकार मन के चोट को भाँपते हैं और उसकी कसक को महसूस भी करते हैं| वे देश- दुनिया की अंतर्तम सच्चाई को शब्दबद्ध कर आभासी दुनिया और दुनियावी यथार्थ केजलऔर दूध वाले ऐक्य का भेद अपनी तेवरियों के माध्यम से स्पष्ट करने की सफल कोशिश रहे हैं |यह स्पष्टीकरण सिर्फ भेदों के आख्यान निर्माण से संबद्ध नहीं है वरन यह वैचारिक क्रांति से उद्भूत होने वालेव्यापक बदलाव की आशा से जुडा हुआ है | डॉ. प्रेमचंद जैन का आत्मकथ्य, “तेवरीकार तेवरी मानसिकता से इस देश को जगाने में सफल हों ..”2इस तथ्य की पुष्टि कर रहा है |एक व्यापक बदलाव ला सकने की क्षमता रखने वाली मानसिकता ‘तेवरी’ का अस्त्र-शस्त्र ‘शब्द’है | कलम-क्रांति के सूत्रधार ‘विचार’ और हथियार ‘शब्द’ सबके चिर-परिचित हैं | दर्शन बेजार के तेवरी संग्रह की समीक्षा करते हुए डॉ. रवीन्द्र भ्रमर लिखते हैं, “तेवरी के शब्द-संधान को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है की वर्तमान सामाजिक विसंगतियों और सामाजिक विद्रुपताओं में आग लगाने के लिए युवा-आक्रोश की तीसरी आँख खुल गयी है |”3तेवरी का  शब्द संधान यहाँ द्रष्टव्य है :

“बहरी सत्ता, अंधी सत्ता /जागो, आओ, दीवाली है” (विनीता निर्झर, मचान पृ.20)

“कदम-कदम पर हैं बाधाएं लेकिन हम आजाद तो हैं / आगजनी, चोरी, हत्याएं लेकिन हम आजाद तो हैं |”(सुधाकर संगीत, मचान, पृ.65)

“पसीना हलाल करो / काल महाकाल करो / तेल बना रक्त जले / हड्डियाँ मशाल करो / संगीन के सामने / खुर्पी व कुदाल करो / कालिमा को चीर दो / दिशा-दिशा लाल करो /सबसे पहले अब हल / भूख का सवाल करो” (ऋषभदेव शर्मा, तेवरी)

“यहाँ गिरहकट सुंदर-सुंदर हाट सजाये  बैठे हैं |

पूछेगा ‘बेजार’ न कोई तेरे सच के सिक्के को,

यहाँ झूठ के सिक्के ही बाजार दबाये बैठे हैं |” (दर्शन बेजार,ये जंजीरें कब टूटेंगी )

“हाथ जोड़कर महाजनों के पास खड़ा है होरीराम |

ऋण की अपने मन में लेकर आस खड़ा है होरीराम |”(सुरेश त्रस्त, कबीर जिंदा है )


“‘गोबर’ शोषण सहते-सहते

नक्सलवादी बना लेखनी ||

महाजनों को देता गाली

अबके होरी मिला लेखनी ||

अब टूटे हर इक सन्नाटा

ऐसी बातें उठा लेखनी ||”(रमेशराज, अभी जुबां कटी नहीं )

आज से नहीं , सृष्टि के आरंभ से अनाचार और अत्याचार के विरुद्ध खड़े हुए हर मनुष्य की भीतरी शक्ति की संवाहिका के रूप में अधिष्ठित हैं ये सकारात्मक ‘विचार और इनके संवाहक शब्द’ ; तभी तो क्रांति होती है और परिवर्तन आता है, सुधार होता है, जागृति आती है, सुशासन आता है |

यह बड़ी शिद्दत से चाहा हुआ सुशासन, सबको भौंचक्का करते हुए न जाने कब और कैसे दुःस्वप्न में परिणत हो जाता है , इस आशय की कुछ तेवरियाँ यहाँ द्रष्टव्य हैं :

“राष्ट्र के निर्माण के चर्चे किये जिसने बहुत

रात घिरते ही अचानक विष उगलती वह जुबान ||

साथ मिलकर जो लड़े दो सौ बरस अंग्रेज से

वो लगे लड़ने परस्पर खींचकर कसकर कमान ||”(बेजार, दर्शन, खतरे की भी आहट सुन )

“बौनी जनता, ऊँची कुर्सी, प्रतिनिधियों का कहना है

न्यायों को कठमुल्लाओं का बंधक बनकर रहना है

वोटों की दूकान न उजड़े, चाहे देश भले उजड़े

अंधी आँधी में चुनाव की , हर संसद को बहना है”(ऋषभदेव शर्मा, धूप ने कविता लिखी है )

“आजादी के नाम पे बहेलियों के हाथ में

पंछियों की देख-भाल, जै कन्हैयालाल की |” (रमेशराज,जै कन्हैयालाल की)

तेवरी उस उम्मीद का नाम है जो यह चाहती है कि यह भौंचक होनेवाली स्थिति समाज में उत्पन्न न हो | यह लोक की जागृत चेतना है और सभी की जागृति की प्रबल पक्षधर भी | जागृत अवस्था में किया गया कार्य पश्चाताप का हेतु नहीं बनता है | यह सजगता का अभाव ही है कि हर पाँच साल में मिलने वाले एक दिन के अधिकार के उपयोग में भी सावधानी नहीं बरती जाती है जिससे आगे पांच सालों तक मुँह बाए रहने की स्वअर्जित बेबसी होती है | एक पल की माया और पांच साल की फकीरी, देखें :

“पदचाप लोकतंत्र की बस एक पल सुने

फिर पाँच साल तक तके मुंह बाय फकीरा |” (ऋषभदेव शर्मा, तरकश )

“ये बाघों का देश है, जन-जन मृग का रूप

अब तो चौकस रहना सीखो, किसी हिरण की मौत न हो

संसद तक भेजो उसे जो जाने जन पीड़

नेता के लालच के चलते, और वतन की मौत न हो |”(रमेशराज, घड़ा पाप का भर रहा)

“लोग ढूंढा किए देश अख़बार में, देश करता फिरा हॉकरीहॉकरी |

अब निराला नहीं औ’ न इकबाल हैं, मंच पर रह गई जोकरी जोकरी |” (ब्रजपाल सिंह शौरमी)

विद्वानों के अनुसार अपने साहित्यिक परिवेश में तेवरीकार कबीर, निराला, मुक्तिबोध, धूमिल और नागार्जुन के अधिक निकट जान पड़ते हैं | वास्तव में उनकी सबसे अधिक निकटता इंसानियत और शहादत से है | आजादी की जंग और अपने देश एवं देशवासियों के लिए देशप्रेमियों के जुनून से काफी प्रभावित रहे तेवरीकार, तभी तेवरी काव्यांदोलन के कई काव्य संग्रह क्रांतिकारियों (राम प्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, अशफाक़उल्ला खां इत्यादि) को ही समर्पित हैं | उन शहीदों की विरासत है यह आजाद हवा, आजाद धरती और आजाद आसमान जिसमें हम अपने अरमानों को तो पूरी तवज्जो दिए हुए हैं पर क्या कहीं उनकी याद और अहमियत भी बाकी है ? हमारी बदली फितरत की तस्वीर कुछ ऐसी है :

आजादी क्या मिल सकती थी सिर्फ गरजते नारों से –

इसके लिए लक्ष्मीबाई जूझी थी तलवारों से ||

क्या अतीत को समझोगे तुम वर्तमान के गायक हो-

तुम तो अभिनंदन के भूखे हो मौजूदा सरकारों से || (दर्शन बेजार, 09-10-2017, फेसबुक)

पत्रकार का हो गया नेता से गठजोड़

दोनों मिलकर देश की बांहें रहे मरोड़ | (रमेशराज, 12-01-2017, फेसबुक)

जहाँ इस मिलन की उपेक्षा कर कलम अपनी धार और दिशा स्वयं तय करती है वहां अनचाही घटनाएँ सहजता से घट जाती हैं  | तेवरीकार रमेशराज के अनुसार तेवरी “अँधेरे के बीच मजदूर के पास एक लालटेन सा है |”4काव्य विधा तेवरी की कविताओं की विशेषताओं को कथ्य और भाषा के स्तर पर बाँट कर प्रो. दिलीप सिंह ने उसका सरल एवं हृदयग्राही सार प्रस्तुत किया है | उनके अनुसार, “ कथ्य के स्तर पर यह कहा गया है कि असंतोषजन्य आक्रोश इसका मुख्य भाव है, रचनात्मक क्रांति इसका लक्ष्य है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश इसकी भावभूमि है, दुरभिसंधियों का पर्दाफाश करना इसकी मंशा है और जागृति प्राप्तव्य है |”5दर्शन बेजार के तीसरे काव्य संग्रह ‘ये जंजीरें कब टूटेंगी’ की समीक्षा करते हुए डॉ. भगवती प्रसाद शर्मा तेवरी की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं, “तेवरी तलवार है, मुक्ति के लिए शमशीर है, पीड़ा को अंगार में बदलने वाली तासीर है | यह ज्वालामुखी की तरह फूटती है और बन्धनमुक्त कराने के लिए क्रांतिपथ बन जाती है |”6

अंग्रेजों से टटके आजाद हुए भारत में कहाँ से आईं दुरभिसंधियां जिनके निवारणार्थ तेवरी का साहित्य जगत में प्राकट्य हुआ ! अंग्रेजो के दिए घाव की पीड़ा से भारतमाता अभी पूरी तरह बाहर भी न आई थीं कि अपने सपूतों ने उन्हें खंजर चुभाने आरंभ कर दिए | उजड़ा हुआ संसार अभी पूरी तरह बस भी न पाया था कि पुनः उजाड़ने की कवायद प्रारंभ हो गई | तेवरीकारों ने अपने सृजन कर्म के माध्यम से जहाँ ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ इन तथ्यों को स्पष्ट किया है वहीँ उनकी कविताएँ चीखती हुई सुनाती हैं तब से अब तक की भयावह दुर्दशाओं को और करना चाहती हैं बदलाव वक्त के ढर्रे में | पर चीखें सुन कानों और आँखों को बंद करने वाली प्रजाति पर सब बे – असर ! संभवतः असर को समय की दरकार है !

“एक अभागिन चीरहरण पर बिलख-बिलख कर चिल्लाई ,

आँखे नीची किये उधर से चले गये मुंह फेरे लोग” (दर्शन बेजार, ये जंजीरें कब टूटेंगी)

“केवल अंगूठे नहीं मांगे आज द्रोण भी

भील को करे हलाल, जै कन्हैयालाल की”(रमेशराज, जै कन्हैयालाल की)

“दीप से छत जल रही है

आस्था हर छल रही है

गिरगिटी काया पहन कर

रोशनी खुद छल रही है

आँख में आहत सपन की

मौन पीड़ा पल रही है” (12-06-2011,ऋषभदेव शर्मा, tevari.blogspot.com,)

“जमाखोरों कुशल चाहो अगर तो ध्यान से सुन लो

निकालो अन्न निर्धन का जहाँ तुमने छुपाया है |” (कबीर जिंदा है, देवराज)

स्वयं भूखे रहकर औरों का भूख मिटाने की रीति निभाने वाली इस धरती पर अपनों ने अपनों को महज अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु अन्न का मोहताज बना रखा है | अंग्रेजों ने भूखा रखा बात पल्ले पड़ती है पर आजाद भारत के आजाद निवासियों ने आजाद निवासियों का जीना ऐसा दूभर क्यों कर रखा है ? क्या स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने घर में अपनों का कैद पाने और जुल्म सहने के लिए अपना बलिदान दिया था ? पहले जो शोषक था हम उसे पहचानते थे अबकी बार शोषक मुखौटाधारी है, मायावी है | वह अपनी मीठी बातों में उलझालेने की कला का महारथी है |आजादी के कुछ सालों बाद से ही समाज की बदलती परिस्थितियों एवं सामाजिकों के बदलते रंग-ढंग के साथ तेवरी काव्यधारा की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी थी | सन 1981 में यहविधिवत प्रकाश में आई |तेवरी काव्यांदोलन के आरंभिक समय में तेवरी काव्यधारा के अनेक सक्रिय रचनाकारों ने  बढ़ चढ़ कर अपना योगदान दिया था, उनमे से कुछ के नाम यहाँ उल्लिखित हैं – पवन कुमार पवन, विनीता निर्झर, ऋचा अग्रवाल, राजश्री रंजिता, राजेश महरोत्रा, गिरिमोहन गुरु, दिनेश अंदाज, ब्रजपाल सिंह शौरमी, हरिराम चमचा, तुलसी नीलकंठ, रघुनाथ प्यासा,श्याम बिहारी श्यामल, विक्रम सोनी, जगदीश श्रीवास्तव,गजेंद्र बेबस, विजयपाल सिंह, अनिल कुमार अनल, अरुण लहरी, गिरीश गौरव, योगेंद्र शर्मा, सुरेश त्रस्त, शिव कुमार थदानी इत्यादि | आज भी देश के कोने-कोने में धारदार तेवरियाँ अवश्य लिखी जा रहीं हैं जो छिटपुट होने से सर्वसुलभ नहीं हैं | आवश्कता हैसुप्रतिष्ठित तेवरी काव्य विधा को हिंदी साहित्येतिहास में अंकित करने की ताकि हिंदी साहित्य की यह महत्वपूर्ण निधि भविष्य को उसके भटकाव और अलगाव  के क्षणों में दिशा देने के लिए सर्वप्राप्य रहे |

साहित्य की समृद्धि और सामाजिकों के मन का परिष्करण करती तेवरियां आज भी समय की जरुरत हैं | वर्तमान समय में तेवरी को अविराम गति प्रदान करनेवालों में उल्लेखनीय नाम हैं : दर्शन बेजार, रमेशराज और ऋषभदेव शर्मा | फेसबुक और ब्लॉगों (हिंदी तेवरी साहित्य, तेवरी, तेवरी गजल विवाद) पर भी इनकी तेवरियाँ उपलब्ध हैं | तेवरी के घोषणापत्र के लेखक एवं तेवरीकार डॉ. देवराज सहित ये तेवरीकार त्रय सम्मिलित रूप में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तेवरी काव्यधारा के  चार मजबूत आधार स्तंभ हैं |इनमें रमेशराज के चर्चित तेवरी संग्रह हैं – “सिस्टम में बदलाव ला, घड़ा पाप का भर रहा, धन का मद गदगद करे, रावण कुल के लोग, ककड़ी के चोरों को फांसी, दे लंका में आग, होगा वक्त दबंग, आग जरुरी, मोहन भोग खलों को, आग कैसे लगी, बाजों के पंख कतर रसिया, जय कन्हैयालाल की, ऊधौ कहियो जाय” इत्यादि | इनके समस्त तेवरी संग्रहों का संकलन भी  “रमेशराज के चर्चित तेवरी संग्रह”नाम से सन 2015 में सार्थक सृजन प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है | इन्होने लंबी तेवरी और द्विपदी के साथ ही हाइकु भी लिखा है | इनके द्वारा संपादित तेवरी संग्रह हैं : अभी जुबां कटी नहीं(1982), कबीर जिंदा है (1983), इतिहास घायल है (1984) इत्यादि |दर्शन बेजार के चर्चित तेवरी संग्रह हैं – एक प्रहार लगातार (1985), देश खंडित न हो जाए (1989), ये जंजीरें कब टूटेंगी (2010), खतरे की भी आहट सुन (प्रकाशनाधीन) इत्यादि |ऋषभदेव शर्मा के चर्चित तेवरी संग्रह हैं –तेवरी (1982), तरकश (1996), धूप ने कविता लिखी है (2014) इत्यादि|

दर्शन बेजार ने अपने आलेख “संख्या –बल लोकतंत्र का मूल आधार” में तेवरी विधा के आविर्भाव की घटना को उजागर किया है | उनके अनुसार, “लगभग सत्ताईस-अट्ठाईस वर्ष पूर्व जनपद मुजफ्फरनगर के क़स्बा ‘खतौली’ में आयोजित एक साहित्यिक विचार-गोष्ठी में श्री ऋषभदेव शर्मा ‘देवराज’ तथा डॉ. देवराज ने जनसापेक्ष कविता जो कथित गजल-शिल्प में लिखी जा रही थी , को ‘तेवरी’ नाम देकर एक नई विधा को जन्म दिया |”7 पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन, मेरठ में 11 जनवरी, 1981 को “ऋषभदेव शर्मा ने “नए कलम-युद्ध का उद्घोष”शीर्षक एक पर्चा प्रस्तुत किया जिसमें नई धारदार अभिव्यक्ति वाले रचनाकर्म की आवश्यकता को प्रतिपादित किया गया और ऐसी रचनाओं के लिए ‘तेवरी’ नाम प्रस्तुत किया गया |”8        तेवरी काव्यांदोलन के प्रवर्तक ऋषभदेव शर्मा के प्रथम तेवरी संग्रह ‘तेवरी (देवराज, ऋषभ : 1982)’ के प्रकाशन के साथ ही 11 जनवरी 1982 को तेवरी काव्यांदोलन की आधिकारिक घोषणा कर दी गई | उत्साही तेवरीकारों के साथ ही देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने इस काव्यधारा से संबंधित आलेखों और रचनाओं को प्रकाशित करने में कोई कोताही नहीं बरती | इनमें से कुछ मुख्य पत्र-पत्रिकाओं के नाम हैं – “तेवरी पक्ष, सम्यक, जर्जर कश्ती, कुंदनशील, कल्पांत, हस्तांकन, दैनिक पंजाब केसरी, साप्ताहिक हिंदुस्तान, युवाचक्र, शिवनेत्र, संवाद, मंथन, उन्नयन, सर्वप्रिय, सहकारी युग, सारिका, अंतर्ज्वाला,इत्यादि |“तेवरी पक्ष” पत्रिका के संपादक रमेशराज आज भी इसका अनियतकालीन संपादन कर रहे हैं | शीघ्र ही इसे तेवरी पक्ष त्रैमासिक पत्रिका के रूप में इंटरनेट (issue.com) पर उपलब्ध कराने की योजना को कार्यरूप देने में संपादक महोदय जुटे हुए हैं |

एक ओर तेवरी काव्यधारा के अनुकूल पक्ष उसे गति प्रदान कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर प्रतिकूल पक्ष की सक्रियता से विकास - मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो रहे थे | एक तरफ इनकी जन सापेक्षता कटघरे में थी और दूसरी तरफ इनकी तुकांत वाली शैली में कुछ बुद्धिजीवियों को गजल की खुशबू आ रही थी | जनवादी और प्रगतिशील खेमे के विद्वानों का तर्क था कि हमारी रचनाएँ भी जन सापेक्ष ही हैं फिर भला आप हमसे अलग कैसे हुए !अपने आलेखों के माध्यम से विद्वानों ने तेवरी पर होने वाले समस्त प्रहारों का खंडन किया है जिसमें से कुछ यहाँ द्रष्टव्य है –

तेवरी पर गजल के आक्षेप के संदर्भ में दर्शन बेजार लिखते हैं, “माना कि आज आम आदमी प्रणय के लिए नहीं, रोटी के लिए अधिक छटपटा रहा है , साहित्यकार भी उसे रोटी की चाहत को शब्दबद्ध कर रहा है, किन्तु उस रचना में गजल का आवश्यक प्राणतत्व ‘प्रेम’ ही नहीं है तो वह गजल कैसे हुई ?”9यहाँ तेवरीकार का आशय प्रेम के उस विशेष पक्ष से है जो सामान्यतः गजल में मुखरित होता है | तेवरी में प्रेम तत्व अपने गहन, सकारात्मक और बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्वीकृत है | इस संदर्भ में रमेशराज का विचार भी उल्लेखनीय है, “तेवरी अर्थात ऐसे ‘तेवर वाली’ भाव-भंगिमा जो प्यार के संसार पर प्रहार करनेवालों के विरोध में मानवीय चेतना को अग्नि-धर्म निभाने को प्रेरित करती है |”10प्रो ऋषभदेव शर्मा के अनुसार तेवरी की विशिष्टता यह है कि यह शिल्प मुक्ति का आंदोलन हैं | यहाँ गीत और गजल परस्पर अपने-अपने शिल्प से मुक्त हैं | “तेवरी का शिल्प बड़ी सीमा तक गीत का शिल्प भी है, केवल गजल का ही नहीं | गजल की बहुत सारी शर्तों को स्वीकार नहीं करता | गजल की सबसे बड़ी शर्त है कि गजल में एकान्विति नहीं होती | गीत की सबसे बड़ी शर्त है कि उसमें एकान्विति होती है | तेवरी की शर्त है कि पहले तेवर से अंतिम तेवर तक, एक भाव क्रमशः उद्दीप्त होता चलता है और अंतिम तेवर तक आते-आते वह पूरी तरह से पूरी रचना का जो एकान्वित प्रभाव पड़ना चाहिए उसे निष्पन्न करता है | वस्तुतः ‘तेवरी’ गीत और गजल दोनों के शिल्प को फ्यूज करके नया शिल्प बनाने का प्रयास था | इसमें हम सफल भी हुए |”11 इनके अनुसार तेवरीकार ‘प्रकाश प्रहरी’ हैं | कृत्रिम उजाले में चुँधियाई आँखों को सच्चाई की असलियत दिखाती हैं तेवरियाँ,जैसे डिजिटलाइजेसन और अमीरीकरण के बीच गरीबों,अशिक्षितों और शिक्षित बेरोजगारों की भरमार |गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से पटेपड़े इस देश में न जाने इसके कितने वासिंदे जेठ की तपन और पौष की ठिठुरन आशियाने के बिना सहने को विवश हैं ! रोज बड़े-बड़े भंडारे होते हैं पर जलते पेट जलते ही रहते हैं ! जलती पेट वालों की लाशें भी लावारिस-सी कहींपड़ी रहतीं हैं! न जाने कितनी योजनाओं का हर रोज कार्यान्वयन होता है पर गरीबों का चेहरा मुरझाया-सा ही रहता है | इन योजनाओं के नाम पर खर्ची जाने वाली अथाह राशि क्या सीधे लाभार्थियों  तक पहुँचती हैं या बीच में ही कहीं डकार ली जाती हैं ?वृद्धों की अवमानना, आस्था की छाँव में होता मान-हनन, कार्यस्थल पर पद प्रतिष्ठित सक्षम स्त्री की ओट में जबरन चलता पुरुष हुक्म और लिंगभेद की गृह-राजनीतिसहित सारी विद्रूपताओंऔर मिली-भगत की सत्यता की बखिया उधेड़ती तेवरी संवेदना के धरातल पर समाज की सर्जरी चाहती है पर यह साध्य तभी  सधेगा जब हर एक  की आँख खुलेगी और नसों में लहू उबलेगा | इसमें शब्द की महती भूमिका को स्पष्ट करतीं हैं तेवरी संग्रह “धूप ने कविता लिखी है” की निम्नोद्धृत पंक्तियाँ :

 ‘जब नसों में पीढ़ियों की हिम समाता है / शब्द ऐसे ही समय तो काम आता है |’


संदर्भ सूची :

1.  रमेशराज, 11-07-2016,विरोध रस के कवि दर्शन बेजार, hinditewari-29.blogspot.in

2.  गुप्ता, डॉ. एस एन (संपादक) मंथन -1, पृ.6

3.  ‘भ्रमर’, डॉ. रविन्द्र, 10-07-2016, तेवरी युवा आक्रोश की तीसरी आँख, hinditewari29.blogspot.in

4.  रमेशराज, जै कन्हैयालाल की,(2015) अलीगढ़ : सार्थक सृजन प्रकाशन, भूमिका

5.  सिंह, डॉ. विजेंद्र प्रताप. ऋषभदेव शर्मा का कवि कर्म(2015), नजीबाबाद : परिलेख प्रकाशन, पृ.122

6.  शर्मा, डॉ. भगवती प्रसाद,11-07-2016,कवि अपने युग, समाज और परिवेश की देन,hinditewari-29.blogspot.in

7.  बेजार, दर्शन, 13-07-2016, संख्या –बल लोकतंत्र का मूल आधार,hinditewari-29.blogspot.in

8.  शर्मा, डॉ.ऋषभदेव, हिंदी कविता : आठवाँ नवां दशक, 1994, खतौली : तेवरी प्रकाशन, पृ. 150

9.  बेजार,दर्शन,13-07-2016, गजलियत के बिना गजल कैसी, hinditewari-29.blogspot.in

10.                                                                              रमेशराज, 22-09-2015, तेवरी इसलिए तेवरी है,kavyasagar.com/tevari-par-lekh-by-ramesh-raj/

11.       सिंह, डॉ. विजेंद्र प्रताप. ऋषभदेव शर्मा का कवि कर्म(2015), नजीबाबाद : परिलेख प्रकाशन, पृ.122




Tuesday, September 10, 2019

तेवरी को विवादास्पद बनाने की मुहिम +रमेशराज


तेवरी को विवादास्पद बनाने की मुहिम

+रमेशराज 
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           ग़ज़ल-फोबिया के शिकार कुछ अतिज्ञानी हिन्दी के ग़ज़लकार तेवरी को लम्बे समय से ग़ज़ल की नकल सिद्ध करने में जी-जान से जुटे हैं। तेवरी ग़ज़ल है अथवा नहीं] यह सवाल कुछ समय के लिये आइए छोड़ दें और बहस को नया मोड़ दें तो बड़े ही रोचक तथ्य इस सत्य को उजागर करने लगते हैं कि हिन्दी में आकर ग़ज़ल की शक़ल से गीतनुमा कुल्ले तो फूट ही नहीं रहे हैं]  उसमें हिन्दी छन्दों की जड़ें भी अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही हैं।
      Hkys gh उर्दू-फारसी के जानकार हिन्दी ग़ज़लकारों पर हँसें] बहरों के टूटने की शिकायत करें लेकिन हिन्दी का ग़ज़लकार ग़ज़ल की नयी वैचारिक दिशा तय करने में लगा हुआ है। हिन्दी में ग़ज़ल अब नुक्ताविहीन होकर *गजल’ बनने को भी लालायित है। उसकी शक़्ल भले ही ग़ज़ल जैसी हो लेकिन उस शक़्ल की अलग पहचान बनाने के लिये कोई उस पर *गीतिका’ का लेप लगा रहा है तो कोई उस पर *मुक्तिका’ का पेंट चढ़ा रहा है। ग़जल के स्वतंत्र व्यक्तित्व की पहचान स्थापित करने की इस होड़ में ग़ज़ल को *नई ग़ज़ल, *अवामी ग़ज़ल, व्यंग्यजल*] *अग़ज़ल] *सजल’ के कीचड़ esa भी धकेला जा रहा है। नये-नये नामों के कीचड़ में सनी]  कुकुरमुत्ते की तरह उगी और तनी]  इसी हिन्दी ग़ज़ल को देखकर अब यह आसानी से तय किया जा सकता है कि-
हिन्दी में ग़ज़ल ग़रीब की बीबी है-
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“आज ग़ज़ल धीरे-धीरे गरीब की बीबी होती जा रही है। लोग उसकी *सिधाई (सीधेपन) का भरपूर और गलत फायदा उठा रहे हैं। हर कोई ग़ज़ल पर हाथ साफ कर रहा है और ग़ज़ल टुकुर-टुकुर मुँह देख रही है।“
      कैलाश गौतम, प्रसंगवश, फरवरी-1994, पृ. 51

हिन्दी में ग़ज़ल की सार्थक ज़मीन कोई नहीं
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“इधर लिखी जा रही अधिसंख्य ग़ज़लों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दी ग़जलों के पास अपनी कोई सार्थक जमीन है ही नहीं। मेरी यह बात निर्मम और तल्ख लग सकती है। किन्तु बारीकी से देखें और हिन्दी ग़ज़ल की जाँच-पड़ताल करें तो अधिसंख्य ग़ज़लों में कच्चापन मिलेगा। दोहराव] विषय की नासमझी] अनुभवहीनता और कथ्यहीन अशआर इस कदर लिखे और प्रकाशित हुए हैं कि स्तरीय ग़ज़लें कहीं भीड़ में खो गयी हैं।“
      ज्ञान प्रकाश विवेक] प्रसंगवश] फरवरी-1994] पृ. 52

हिन्दी ग़ज़ल न उत्तम कविता है] न उत्तमगीत
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 “अभी तो मुझे हिन्दी ग़ज़ल से संतोष नहीं है-- बाजार में माल चल गया। शुद्ध के नाम पर क्या-क्या वनस्पतियां मिलावट में आ गयी]  इसका विश्लेषण  साधारण पाठक तो कर नहीं पाता। हिन्दी में लिखी जाने वाली ग़ज़ल नामक रचना न उत्तम कविता है] न उत्तम गीत।“
      डा. प्रभाकर माचवे] प्रसंगवश] फरवरी-1994 पृ. 51

शायरी चारा समझकर सब गधे चरने लगे
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“आज ग़जल के नाम पर हिन्दी में जो कुछ छप रहा है]  ऐसी रचनाओं को ही देखकर कभी समर्थ रामदास ने मराठी में कहा था-** शायरी घास की तरह उगने लगी है।“  किसी ने उर्दू में कहा-** शायरी चारा समझकर, सब गधे चरने लगे।“
                           डा. प्रभाकर माचवे] प्रसंगवश] 1994 पृ. 51
      हिन्दी में नुक़्ताविहीन *गजल’] * मुक्तिका’] ‘गीतिका’]  ‘व्यंगजल’] ‘अगजल’] ‘नयी गजल’] ‘अवामी ग़ज़ल’] ‘सजल’] की फसल के आकलन के लिये उपरोक्त तथ्यों का सत्य इस बात की चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि ग़ज़ल की काया की माया में कस्तूरी हिरन की तरह भटकने वाले हिन्दी ग़ज़लकार]  ग़ज़ल के उस्तादों या पारखी विद्वानों से कुछ भी समझने-सीखने को तैयार नहीं हैं। उनकी ग़ज़ल]  ग़जल है भी या नहीं] इसकी परख के लिये वे ग़ज़ल के उस्तादों के पास इसलिए नहीं जाते क्यों कि उन्हें पता है कि वे हिन्दी में ग़ज़ल को लाकर जिस प्रकार उसकी वैचारिक दिशा तय कर रहे हैं]  उसमें ग़ज़ल की मूल आत्मा *प्रणयात्मकता’  को ही नहीं] उसके शिल्प के पक्ष मतला&मक्ता को काटा-छाँटा गया है। ग़ज़ल की मुख्य विशेषता *हर शे’र की स्वतंत्र सत्ता’ को भी धूल चटाकर उसमें गीत का ओज भरा गया है। हिन्दी ग़ज़ल के इस सरोज को ये एक दूसरे को दिखा रहे हैं। एक-दूसरे के लिये प्रशंसा-गीत गा रहे हैं। लेकिन ग़ज़ल के उस्तादों से कतरा रहे हैं।
      ग़ज़ल के एक उस्ताद हैं तुपैQल चतुर्वेदी]  जो *लफ्ज’  नामक पत्रिका का संपादन करते हैं। उन्होंने लफ्ज़ वर्ष-1 अंक-4 के पृष्ठ-6364 पर हिन्दी ग़जल के एक चर्चित हस्ताक्षर आचार्य भगवत दुवे के ग़ज़ल संग्रह *चुभन’ की समीक्षा लिखी है। इस पुस्तक की ग़ज़लों को लेकर लिखी गयी भूमिका में भले ही हिन्दी ग़ज़ल के एक अन्य हस्ताक्षर डा. उर्मिलेश ने तारीफों को पुल बाँधे हों]  किन्तु *चुभन’ ग़ज़ल संग्रह के बारे में तुफैल चतुर्वेदी का क्या कहना है] आइए गौर फरमाएँ-

हिन्दी ग़ज़ल में ग़ज़ल के मूलभूत नियमों का उल्लंघन
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**समीक्षा के लिये प्रस्तुत आचार्य भागवत दुवे की पुस्तक *चुभन’  छन्द-दोष]  भाषा का त्रुटिपूर्ण प्रयोग] व्याकरण की चूक]  ग़ज़ल में शेरियत का अभाव]  ग़ज़ल के मूलभूत नियमों के उल्लंघन से भरी पड़ी है। आप किसी भी गलती का नाम लें]  वो किताब में मौजूद है।“  
      संग्रह की समीक्षा करते हुए तुफैल चतुर्वेदी आगे लिखते हैं-
हिन्दी ग़ज़ल बढ़ई द्वारा मिठाई बनाने की कोशिश
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**मूलतः *चुभन’ पुस्तक बढ़ई द्वारा मिठाई बनाने की कोशिश है। जो लौकी पर रन्दा कर रहा है]  आलू रम्पी से काट रहा है]  मावे का हथौड़ी से बुरादा बना रहा है और पनीर को फैवीकाल की जगह प्रयोग करने के बाद प्राप्त हुई सामग्री को 120 रू. में बेच सकने की कोशिश कर रहा है। यहाँ मुझे एक ऑपेरा की समीक्षा याद आती है]  जिसमें समीक्षक ने उसकी गायिका को मशवरा दिया था कि गला खराब हो तो गाना गाने की जगह गरारे करने चाहिए।“ (लफ्ज वर्ष-1 अंक-4] पृ. 63-64)
      हिन्दी के विद्वान लेखक कैलाश गौतम]  ज्ञान प्रकाश *विवेक’] डॉ. प्रभाकर माचवे और उर्दू के उस्ताद शायर तुफैल चतुर्वेदी की उपरोक्त टिप्पणियों से स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी में लिखी या कही जाने वाली ग़ज़ल की औसत शक़ल उस ग़ज़ल की तरह है जिसकी आँखें नोच ली गयी हैं]  टाँxsa तोड़ दी गयी है]  जीभ बाहर की तरफ निकली हुई है] उसके गले से जो चीख निकल रही हैA  उसे हिन्दी ग़जलकार कथित सुन्दर ही नहीं]  सुन्दरतम शब्दों में बाँध रहा है और अपनी इस अभिव्यक्ति को ग़ज़ल नाम से मनवाने को आतुर लग रहा है।
      बहरहाल] हिन्दी साहित्यजगत में हिन्दी ग़ज़लकार काँव-काँव के महानाद की ओर अग्रसर हैं। इनके बीच उभरते हुए जो ग़जल के स्वर हैं] उनके सामाजिक सरोकार एक भयानक चीख-पुकार में तब्दील होते जा रहे हैं।

अब ऐसे हैं हिन्दी ग़ज़ल के ‘वक़्त के मंजर’
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      डॉ. ब्रह्मजीत गौतम हिन्दीग़ज़ल के चर्चित हस्ताक्षर ही नहीं] उच्चकोटि के समीक्षक और आलोचक हैं। उनका ग़जल संग्रह *वक्त के मंज़र’ इस बात की सीना ठोंककर गवाही देता है कि-
वेश कबिरा का धरे ललकारती है अब ग़ज़ल
अब तो हुस्नो-इश्क की बातें पुरानी] क्या कहूँ।
      *आत्मिका’  के रूप में डॉ. ब्रह्मजीत गौतम यह भी स्वीकारते है कि वे कबीर जैसे फक्कड़पन के कारण साहित्य के यातायात के कायदे-कानून समझे बिना ग़जल की राजधानी पहुँच गये हैं-
कायदे-कानून यातायात के समझे बिना
मैं हूँ आ पहुँचा ग़ज़ल की राजधानी] क्या कहूँ।

हिन्दी ग़ज़ल के सामाजिक सरोकार
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      कबिरा का वेश धारे डॉ. ब्रह्मजीत गौतम की ग़ज़ल किसको ललकार रही है] यह तो उनके शे’र से पता नहीं चलता]  किन्तु यह तथ्य अवश्य उजागर होता है कि उनकी ग़ज़ल ने हुस्नोइश्क की बातों को पुराना कर दिया है और एक नये रूप में पहचान बनाने के लिए सामाजिक सरोकार के सारगर्भित प्रतिमान गढ़ रही है। उनके संग्रह की प्रथम ग़ज़ल के प्रथम शे’र में ही सामाजिक सरोकार की सामाजिक विसंगतियों को नेस्तनाबूत करने के लिए युद्ध करने को तत्पर एक सैनिक जैसी पहली ललकार देखिए-
      गीत खुशियों के किस तरह गाऊँ
      बेवफा तुझको भूल तो जाऊँ।
      उक्त शे’र में आज का कबीर हुस्नो-इश्क की बातें छोड़कर किस विसंगति पर तीर छोड़ रहा है]  ग़ज़ल को अग्निऋचा बताने वाले ग़ज़ल के पुरोधा अगर बता सकें तो पूरा हिन्दी ग़ज़ल साहित्य आनंदानुभूति से भर सकता है। हमारी समझ से तो इस तीर की तासीर कोई इठलाता-मदमाती प्रेमिका ही बता सकती है।
      इसी ग़ज़ल के दूसरे शे’र में आज का कबीर इस बात के लिये अधीर है कि *जालिम’ शब्द को हिन्दी के अनुकूल किया जाये और उसे *जालिमा’  की लालिमा से और नुकीला और चमकीला बनाकर उर्दू अदब के प्रतिकूल किया जाये।
जालिमा] ग़म तेरी जुदाई का
चाहकर भी भुला नहीं पाऊं।
      जुदाई के ग़म esa जो आक्रोश उत्पन्न हो रहा है] वह प्रेमिका को *जालिमा’  बता रहा है] हमें तो इस सामाजिक सरोकार की लड़ाई में आनंद आ रहा हैA  mDr शे’र के पाठक कैसा महसूस कर रहे हैं] वे ही जानें।
      बहरहाल]  अपने इसी अनिर्वचनीय आनंद में गोता लगाते हुए आइए इस संग्रह की दूसरी ग़ज़ल पर आते हैं। इसका भी रहस्य आप सबको बताते हैं-

हिन्दी ग़ज़ल गीत की शक़ल
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      ग़ज़ल का प्रत्येक शे’र उसके अन्य शे’रों से अलग और स्वतंत्र सत्ता रखता है। यह ग़ज़ल की महत्वपूर्ण विशेषता ही नहीं उसकी अनिवार्य शर्त है।  किन्तु हिन्दी के ग़ज़लकार इस शर्त की हत्या कर हिन्दी में ग़ज़ल कुछ इस तरह कह रहे हैं कि उसकी कथित ग़ज़ल के शेरों के भाव एक-दूसरे के कथ्य के पूरक बन जाते हैं और गीत जैसा रूप दिखलाते हैं। ग़ज़ल को कीचड़ बनाकर ग़ज़ल के मलवे से उठाया गया यह कमल ग़ज़ल की कैसी शक़ल है] आइए इसका भी अवलोकन करें-
      श्री ब्रह्मजीत गौतम की दूसरी कथित ग़ज़ल में आज के मंत्री रूपी महानायक के आगमन की जैसे ही बस्ती को खबर लगती है तो इस ग़ज़ल के पहले शे’र में बस्ती-भर में खुशियाँ छा जाती हैं। दूसरे शे’र में बताया जाता है कि इस महानायक का ज्यों ही दौरे का कार्यक्रम बना था तो बस्ती की तरफ सारी सरकारी जीपें दौड़ पड़ीं। तीसरे शे’र में पंचों की पंचायत बिठाकर उसके स्वागत की तैयारियाँ कर ली गयीं। चौथे शे’र में यह निर्देश दिया गया कि उस महानायक को कौन माला पहनायेगा। और कौन उसका यशोगान करेगा। पाँचवें शे’र का दृश्य यह है कि स्वागत-स्थल को फूलों से इस तरह सजाया गया जैसे वर्षों से वहाँ फुलवारी शोभायमान हो। छठा शे’र पी.डब्ल्यू.डी. विभाग द्वारा दीवारों को पोतने और बजरी से राह सँवारने में जुट गया है। अन्तिम शे’र में महानायक के पधारने और उसके साथ फोटो खिंचाने के जिक्र के साथ-साथ महानायक के वादों की अनुगूँज को रखा गया है।
इस ग़ज़ल में ग़ज़ल के शास्त्रीय सरोकारों से अलग हर अंदाज नया है]  जो उद्धव शतक की याद को तरोताजा करते हुए बताता है कि कोई माने या न माने हिन्दी में ग़ज़ल का रूप गीत जैसा है। इस विषय में उर्दू वालों का विचार क्या है] जानना मना है। यह हिन्दी की ग़ज़ल है]  इसमें ग़ज़लियत तलाशना]  बालू से तेल निकालना है]  बिना सोचे-समझे इसे ग़ज़ल मानना है। यह ग़ज़ल कबीर का वेश धरे हमारे गलीज सिस्टम को ललकार रही है या उसकी आरती उतार रही है]  इसका अनुमान लगाना भी मना है। कुल मिलाकर ग़ज़ल के नाम पर कोहरा घना है।
      अतः बात को न बढ़ाते हुए पुनः कबीर का बानी को दुहराते हुए *वक्त के मंज़र’  संग्रह की तीसरी ग़ज़ल के चौSथे शे’र पर आते हैं। इस शे’र में आज का कबीर बता रहा है कि नायिका के कपोल के तिल ने उसे ढेर कर दिया है-
मेरा कातिल है तेरे रुख का तिल
जान मेरी तो ले गया मुझसे।

क्या बहरों का कबाड़ा कर लिखी जाती है हिन्दीग़ज़ल ?
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      नायिका के तिल पर जान न्यौछावर कर देने वाली तीसरी ग़ज़ल सम्भवतः *फाइलातुन मफाइलुन फैलुन’ बहर में कही या लिखी गयी है। जो कि 17 मात्रा की ठहरती है। इस बहर में ग़ज़ल के प्रारम्भ के दो अक्षरों में दीर्घ के बाद  लघु स्वर का प्रयोग करना आवश्यक ही नहीं] अनिवार्य है। ऐसा न होने पर मिसरा बहर ही नहीं लय से भी खारिज हो जाता है। लेकिन यह हिन्दी ग़ज़ल का ग़ज़ल की बहर से कैसा नाता है कि इस तीसरी ग़ज़ल के मतला की दूसरी पंक्ति के प्रारम्भ में *ऐसी’ शब्द]  इसके चौथे शे’र के पहले मिसरे के आरम्भ में *मेरा’ शब्द]  छठे शे’र के दूसरे मिसरे में *लेके’ शब्दों के प्रयोग के कारण *फाइलातुन’  घटक का *फाइ’ गतिभंगता का ही शिकार नहीं होता]  अपने 17 मात्राओं के निश्चत आधार को भी बीमार बनाता है। फिर भी इसे हिन्दी ग़ज़ल बताने में किसी का क्या जाता है] हिन्दी ग़ज़ल में इस तरह का दोष आता है तो आता है।
      इसीलिए तो हिन्दी ग़ज़ल में आये दोष को लेकर मस्त] बेफिक्र और मदहोश ग़ज़लकार सीना ठोंकते हुए यह बयान देकर महान बनने की कोशिश करता है-
‘जीत’ न करना बह्र की चर्चा अब हिन्दी ग़ज़लों में
वरना इक दिन लोग तुम्हें सब बल्वाई बोलेंगे!
      ग़ज़ल की जान उसकी मूल पहचान *बहर’ को हिन्दी में लिखी जाने वाली ग़ज़ल से धक्के मारकर]  टाँग घसीटकर]  बाल खींचकर बाहर कर देने से अगर हिन्दी ग़ज़लकार के कर्म में संतई’] सहनशीलता आती है और बल्वाई होने के आरोप से मुक्त हुआ जा सकता है तो आजकल इससे उपयुक्त और भला क्या वातावरण हो सकता है। ग़ज़ल के बदन से बहर का यह चीरहरण यदि हिन्दी ग़ज़लकारों के लिये सुकर्म है तो इसमें कहाँ की और कैसी शर्म है

हिन्दी ग़ज़ल के काफियों और रदीफ को विकृत बनाना क्या ग़ज़ल का ओज बढ़ाना है?
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‘वक्त के मंजर’ ग़जल संग्रह के पृ.-33 पर प्रकाशित ग़ज़ल के काफियों का रूप बेहद अनुपम है। इस ग़ज़ल में *शह्र’  काफिये के साथ कदमताल करते हुए *लहर’ और *नहर’ काफिये *लह्र’ और *नह्र’  बनकर लँगड़ाते हुए चल रहे हैं। *लहर’और *नहर’ काफियों की टाँगे तोड़कर *शह्र’ के साथ कदमताल कराने वाला ग़ज़लकार अपने इस सुकृत्य से सम्भवतः अनभिज्ञ नहींA  तभी तो वह सीना तान यह बयान दे रहा है- *काफिये का होश है ना वज़न से है वास्ता’।
      ठीक इसी प्रकार का सुकर्म ग़ज़ल संख्या 26 में किया गया है जिसके काफिये *हवाओं’] *फजाओं’] *युवाओं’  से तालमेल बिठाने के चक्कर में ग़ज़लकार ने अन्तिम शे’र में *पाँवों’ को *पाओं’  में तब्दील कर अपनी नायाब सोच का परिचय दिया है। आगे वाली ग़ज़ल के काफिये में आने वाले स्वर के आधार को बीमार करते हुए *व्यथा’ की तुक *अन्यथा’ से ही नहीं *वृथा’ से भी मिलायी है।
      ग़ज़ल संख्या तेरह में जिस होशियारी के साथ *भारी’ शब्द की तुक *हुशियारी’ बनकर उभरी है। हिन्दी ग़ज़ल के पंडित इस नव प्रयोग पर काँव-काँव करते हुए कह सकते हैं कि यह मूल शब्द की तोड़-मरोड़ के लिए काफिये के रूप में किया गया प्रयोग उतना ही मौलिक है जितना कि ग़ज़लसंख्या पचास में *घबड़ाते’ की तुक *अजमाते’ बनकर प्रयुक्त हुई है। इस प्रयोग ने भी नयी ऊँचाई छुई है।
      ग़ज़ल संख्या बयालीस के मतले में *आसमानों’  की तुक *बेईमानों’ से मिलाकर हिन्दी ग़ज़लकार ने यह भी घोषणा कर दी है कि स्वर के बदलाव के आधार को मारकर भी अशुद्ध काफियों में शुद्ध मतला कहा जा सकता है। सहनशील बने रहने के लिए इस सुकर्म को भी सहा जा सकता है।
      हिन्दी में ग़ज़ल अब हिन्दी छन्द के आधार पर भी अपनी पहचान बनाने को व्याकुल है। इसलिए संग्रह में पृ. संख्या-56 पर एक कथित *दोहा ग़ज़ल’ भी विराजमान है। यह ग़ज़ल इसलिये महान है क्योंकि इसमें काफिये के अन्त में तीन बार *बीर’  तुक का प्रयोग हुआ है। सयुक्त रदीफ-काफिये की इस ग़ज़ल esa एक पहेली है] जिसे हल करते आप काफिये और रदीफ को खोजने के लिये घंटों  मगजमारी कर सकते हैं।
      एक ही कथित ग़ज़ल अगर 100 शे’रों की हो और उसमें स्वर के बदलाव का आधार *काफिया* बीमार नजर आयें तो बात समझ में आती है कि स्वरों के बदलाव का आधार दुहराव का शिकार होगा ही]  किन्तु 5]7]11 शे’रों की ग़ज़ल में यह खामी इस तथ्य को द्योतक है ग़ज़लकार शुद्ध तुकें ला सकता था किन्तु उसने ऐसा न कर बार-बार काफिये को रदीफ की तरह प्रयुक्त कर उसे न तो शुद्ध काफिया रहने दिया और न शुद्ध रदीफ। इस तकलीफ से ग्रस्त आज की हिन्दी ग़ज़ल फिर भी मदमस्त है] तो है।
      डॉ. ब्रह्मजीत गौतम के ग़ज़ल संग्रह *वक़्त के मंजर’  में ग़ज़ल के नाम पर जो कुछ भी परोसा गया है] वह भी इसमें आत्म स्वीकृति के रूप में मौजूद है-
      अपनी ग़ज़लों के लिये अपनी जुबानी क्या कहूँ  
         कैक्टस हैं ये सभी या रातरानी] क्या कहूँ।
      ग़ज़ल यदि रातरानी की तरह खुशबू बिखेरती विधा है तो यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि इस संग्रह की अधिकांश ग़ज़लों से यह खुशबू फरार है। सही बात तो यह है कि हिन्दी में ग़ज़ल के नाम पर एक कैक्टस का जंगल उगाया जा रहा है] जिसमें से बहर का ओज फरार है। काँटे की तरह कसते अशुद्ध रदीफ-काफियों की भरमार है। शे’र की स्वतंत्र सत्ता धूल चाट रही है।
      हिन्दी में आकर ग़ज़ल अपने खोये हुए शास्त्रीय सरोकारों को माँग रही है। हिन्दी ग़ज़ल के पुरोधा हैं कि चुम्बन में आक्रोश]  आलिंगन में क्रन्दन]  प्रणय में अग्निलय  के आशय भी जोड़कर ग़ज़ल को न तो एक प्रणयगीत रहने दे रहे हैं और न उसे सामाजिक सरोकारों से जोड़कर नयी पहचान देने को तैयार हैं। ऐसे विद्वानों को कौन समझाये कि कृष्ण जब रास रचाते हैं तो रसिक पुकारे जाते हैं किन्तु जब वे द्रौपदी की लाज बचाते है तो *दीनानाथ’  कहलाते हैं। चरित्र बदलते ही कैसे नाम भी बदल जाता है] इसकी पहचान शिक्षार्थी और शिक्षक] शासक और शासित] अहंकारी और विनम्र] स्वाभिमानी और चाटुकार के अन्तर को समझने वाले ही बतला सकते हैं। जिन विद्वानों की मति पर रूढ़िवादी चिन्तन के पत्थर रखे हुए हैं]  उन्हें ही तेवरी और ग़ज़ल की प्रथक पहचान करने में परेशानी होती है और सम्भवतः होती रहेगी।

तेवरी को विवादास्पद बनाने में जुटे हैं हिन्दीग़ज़ल के कथित विद्वान
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हिन्दी ग़ज़ल के जो विद्वान ग़ज़ल का उसके शास्त्रीय सरोकारों के साथ सृजन नहीं कर सकते]  ऐसे विद्वान ही तेवरी को विवादासाद बनाने में जी-जान से जुटे हुए हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि इनमें सम्पादक भी शामिल हो गये हैं जो जानबूझ कर तेवरीकारों की प्रकाशनार्थ भेजी गयी कविताओं जैसे *हाइकु’ पर *हाइकु में तेवरी’] *ग़ज़ल’ पर *ग़ज़ल में तेवरी’,*चतुष्पदी शतक’ पर *चतुष्पदी शतक के अंश-तेवरियाँ’, ‘मुक्तक-संग्रह’  पर *मुक्तक-संग्रह के अंश- तेवरियाँ*] *तेवरी’ पर *ग़ज़ल में तेवरी’ का लेबल लगाकर तेवरी के मूल चरित्र *अनीति- विरोध* को ही नहीं] उसके शिल्प को भी संदिग्ध और विवादास्पद बनाने का प्रयास कर रहे हैं। द्विपदीय तेवरों को त्रिपदीय रूप में छापकर अपने इस सुकृत्य पर मगन हो रहे हैं।

तेवरी का प्रामाणिक प्रारूप-
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1&तेवरी न मुक्तक है] न हाइकु है] न दोहा है] न किसी छन्द विशेष का नाम है।
2&बिना विशिष्ट अन्त्यानुप्रासिक व्यवस्था के तेवरी न दोहे में लिखी जाती है] न हाइकु में] न जनक छन्द अथवा किसी अन्य छन्द में लिखी जाती है।
3. तेवरी के समस्त तेवर केवल और केवल द्विपदीय रूप में ही निश्चित तुक-विधान के साथ एक सम्पूर्ण तेवरी का निर्माण करते है   
4& तेवरी के तेवर किसी एक ही छन्द में हो सकते हैं]या दो छन्दों को लेकर भी उनका द्विपदीय रूप निर्धारित किया जा सकता है।   
5& तेवरी के प्रथम तेवर में एक अथवा दो छन्दों की जो व्यवस्था निर्धारित की जाती है] वह व्यवस्था ही हर तेवर में निहित होकर तेवरी को सम्पूर्णता प्रदान करती है।
6& तेवरी के तेवरों को लाँगुरिया] बारहमासी] मल्हार] रसिया] व्यंग्य] आदि शैलियों का समावेश कर रचा जा सकता है। इस शैलियों को विधा समझना ठीक उसी प्रकार है जैसे अतिज्ञानी लोग तेवरी को ग़ज़ल समझते हैं।
     हिन्दी ग़ज़ल के कथित पारखी विद्वानों का कहना है कि-“ तेवरी में पहले एक अतुकांत पंक्ति फिर उसी लय में दो-दो पंक्तियों के जोड़े जिनमें दूसरी पंक्ति का अन्त्यानुप्रास से मेल खाता हो]  स्थूल रूप से यह ग़ज़ल का रूपाकार है।“
इसी कारण तेवरी ग़ज़ल है।
      तेवरी को ग़ज़ल मानने का उपरोक्त आधार अगर सही है तो इसी आधार को लेकर कवित्त की रचना की जाती है। यही आधार पूरी तरह हज़ल में परिलक्षित होता है। तब यह विद्वान कवित्त और हज़ल को ग़ज़ल की श्रेणी में रखने से पूर्व लकवाग्रस्त क्यों हो जाते है? एक सही तथ्य को स्वीकारने में इनका गला क्यों सूख जाता है?
      हज़ल तो शिल्प के स्तर पर हू-ब-हू ग़ज़ल की नकल है। इस नकल को ग़ज़ल कहने की हिम्मत जुटाएँA  हिन्दी ग़ज़ल के पुरोधाओं की बात साहित्य जगत में स्वीकार ली जाये तो तेवरीकार उनके समक्ष नतमस्तक होकर तेवरी को ग़ज़ल मानने के लिये तैयार हो जाएँगे।
      हम मानते हैं कि तेवरी ग़ज़ल की हमशकल है किन्तु न वह ग़ज़ल की हमनवा है और न हमख्याल। शारीरिक संरचना में तो कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई और अंगे्रजों के छक्के छुड़ाने वाली रानी लक्ष्मीबाई समान ही ठहरेंगी। कंस और कृष्ण में भी यही समानता मिलेगी। हिटलर और गांधी में भी कोई अन्तर परिलक्षित नहीं होगा। तब क्या इन्ही शारीरिक समानताओं को आधार मानकर हर अन्तर मिटा देना चाहिए] जिसके आधार पर मनुष्य के चरित्र की विशिष्ट पहचान बनती है।

क्या हज़ल भी ग़ज़ल या हिन्दी ग़ज़ल है\
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      जिन विद्वानों के लिए शरीर और चरित्र एक ही चीज़ है]  वे तेवरी को ग़ज़ल ही सिद्ध करेंगे] लेकिन हज़ल को ग़ज़ल सिद्ध करते समय उनकी बुद्धि कुंठित क्यों हो जाती है? इस प्रश्न पर आकर उत्तर देने में उनकी जीभ क्यों लड़खड़ती है] अतः पुनः पूरे मलाल के साथ यही सवाल. कि ग़ज़ल की शक़ल की हू-ब-हू नकल *हज़ल’  है] क्या हज़ल भी ग़ज़ल या हिन्दी ग़ज़ल है\


                                    *रमेशराज