Friday, July 8, 2016

हिन्दी गीति काव्य में तेवरी की सार्थकता +सुरेश त्रस्त

हिन्दी गीति काव्य में तेवरी की सार्थकता

+सुरेश त्रस्त
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हिन्दी गीति काव्य की नूतन विधा तेवरी का नामकरण आठवें दशक के अन्त और नवें दशक के प्रारम्भ देवराज [द्वै] द्वारा किया गया। एक विशेष तकनीकिय एवं अत्यानुप्रासिक व्यवस्था से युक्त रचनाधर्मिता, जिसमें व्यक्तिगत अनुभवों के स्थान पर सामाजिक सरोकारों के अनुभवों को स्थापित करने की पहल की गयी |  
तेवरी के सूत्रपात एवं नामकरण को लेकर हिन्दी काव्य में जिस प्रकार की उठापटक शुरू हुई, वाद-विवाद उत्पन्न हुए, इस संदर्भ में तेवरी के नियामकों, स्थापकों एवं रचनाकर्मियों ने तेवरी की वकालत करते हुए, उसे सार्थक सारगर्भित और प्रासंगिक सिद्ध करने के लिए अथक प्रयास किये। जबकि तेवरी को बलात् अवतरण मानते हुए एवं उसके शिल्प-पक्ष को खारिज करते हुए सुश्री जया नर्गिंस ने कहा-‘‘ तेवरी लेखकों का यह दावा ही झूठा है कि तेवरी ग़ज़ल से बिल्कुल अलग एक स्वतंत्र विधा है और यह ग़ज़ल की तरह किन्हीं नियमों को नहीं मानती। अगर ऐसा है तो तेवरी में ग़ज़ल की तरह दो-दो पंक्तियों के शे’र क्यों होते हैं।’’
श्री नीतीश्वर शर्मा नीरज ने अपना तर्क दिया ‘‘ आम को इमली कह देने से जिस तरह उसके गुण और स्वाद में कोई अन्तर नहीं आ जाता.... जिस तरह एक कप या गिलास में आप दूध रख सकते हैं और दया, शराब, पानी, जहर भी लेकिन रखे गये द्रव के आधार पर गिलास या कप का नाम बदलने से उसमें क्या तब्दीली हो जायेगी। अतः मैं तेवरी को काव्य की कोई नयी विधा नहीं मानता बल्कि ग़ज़ल या दोहे का रूप लिए [ आकार में लिखी गयी ] कविताओं का नाम है तेवरी |
इतना ही नहीं श्री ज्ञान प्रकाश विवेक ने तेवरी के प्रति अपनी झल्लाहट और बौखलाहट व्यक्त करते हुए कहा-‘‘खूब लिखिये तेवरी और खूब छापिये उन्हें तेवरीपक्ष में, लेकिन एक सवाल जरूर करूंगा आप से-तेवरी ग़ज़ल के शिल्प में क्यों लिख रहे हैं आप? भगवान करे या रमेशराज करे कि तेवरी भी साहित्यिक विधा में गिन ली जाये  और देवराजों, सुरेश त्रस्तों, अरुण लहरियों का कल्याण हो जाये। कोई पूछे कि साहब तेवरी कहीं मैनूफैकचर होती है तो झट मुंह से निकलेगा-अलीगढ़। बुरा न मानें तो एक बात कह दूं कि अब तक की तमाम तेवरियां ग़ज़ल का बिगड़ा हुआ रूप है |”
तेवरी की टैक्निक को ग़ज़ल की नकल मानते हुये युवा कवि सिद्धेश्वर ने सुपरब्लेज [ मासिक ] में ‘महज बहस के लिए’ स्तम्भ के अन्तर्गत एक लम्बी बहस कई अंकों में जारी की | अप्रैल 85 अंक में श्री सतीश पुष्करणा, बी. एल. प्रवीण, तारिक अस्लम तस्नीम का मानना था-‘‘ बात समझने की है कि आदि मानव भी आदमी था आज भी आदमी कहलाता है और सदैव आदमी ही कहलाता रहेगा | श्री रमेशराज द्वारा सुपरब्लेज मार्च 85 अंक में प्रस्तुत आलेख ‘ग़ज़ल, ग़ज़ल हैः तेवरी, तेवरी है’ पढ़कर ऐसा प्रतीत हुआ जैसे यहां भी खालिस्तान की मांग की तरह प्रथकतावादी हाथ खड़ा किया जा रहा है..... जैसे कि कहानी, लघुकथा, परीकथा, दंतकथा, संदर्भ कथा आदि के वर्गीकरण के बावजूद ये सब कहानी हैं , रचना के कथ्य, विस्तार एवं सम्प्रेषणीयता आदि को मद्देनजर रखते हुए तेवरी भी ग़ज़ल का एक उग्रवादी रूप ही है।“
तेवरी के शिल्प-पक्ष को लेकर ग़ज़ल के उक्त पक्षधरों ने तेवरी की सार्थकता को नकारते हुए जिन तथ्यों की ओर संकेत किया, उन तथ्यों के आधार पर निम्न बातें उभर कर सामने आयीं-;
1.   तेवरी, ग़ज़ल से अलग कोई स्वतंत्र विधा नहीं है।
2.    तेवरी की अन्त्यानुप्रासिक व्यवस्था एवं समस्त पंक्तियों का क्रम ग़ज़ल के रदीफ-काफिये तथा उसके शेरों की व्यवस्था हू-ब-हू नकल है।
3.    चूंकि तेवरीकारों को ग़ज़ल की टैक्निक की भी पूरी जानकारी नहीं है, अतः तेवरी में ग़ज़ल के शास्त्रीय पक्ष का पूर्ण निर्वाह न हो सकने के कारण, तेवरी ग़ज़ल का ही एक अपभ्रंश या बिगड़ा हुआ रूप बन कर रह गई है।
4. तेवरी बिना सोचे समझे, अतार्किक ढंग से प्रस्तुत की गई एक ऐसी पहल है जो खालिस्तान की मांग की तरह पृथकवादी-विघटनकारी एवं स्वयं को [ तेवरीकारों को ] स्थापित करने का एक प्रीपेगण्डा, एक स्टन्ट है।
तेवरी और ग़ज़ल के बीच किये गये उक्त प्रकार के घालमेल, भ्रामक स्थितियों एवं उत्पन्न शंकाओं के समाधान हेतु अलीगढ़ से श्री रमेश राज ने तेवरी विधा की एक पत्रिका ‘तेवरीपक्ष’ का प्रकाशन वर्ष 1983 में प्रारम्भ किया, जो नियमित रूप से अब भी प्रकाशित हो रही है। तथा तेवरी विधा के पांच संकलन-‘अभी जुबां कटी नहीं’, ‘कबीर जिन्दा है’ ‘इतिहास घायल है’, ‘एक प्रहारः लगातार’, देश खण्डित हो न जाये’ अपने प्रकाशन ‘सार्थन-सृजन’ से निकाले। इसके अतिरिक्त देवराज [ द्वै ] द्वारा ‘तेवरी’  एवं तेवरी चर्चा शीर्षक से तथा पवन कुमार पवन द्वारा ‘मचान’ शीर्षक से महत्वपूर्ण संकलन प्रकाशित हुए। कुन्दनशील, जर्जर कश्ती एवं प्रतीक, शिवनेत्र मासिक पत्रिकाओं ने भी इस दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
तेवरी की विधागत वकालत करते हुए श्री रमेशराज ने कहा कि-‘‘ ग़ज़ल का अर्थ है प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत | ग़ज़ल अपने प्रारम्भ से ही सामन्तों, अय्याशों, नवाबों के मनोरंजन का साधन रही है | अतः ग़ज़ल समकालीन संदर्भों में सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है।.... ग़ज़ल सदियों से खास आदमी के चरित्र से जुड़ी रहने के कारण, तेवरी की मान्यताओं, जीवन मूल्यों के एकदम विपरीत ठहरती है। ग़ज़ल के साथ सामाजिक दायित्वों का ढिंढोरा पीटने वाले रचनाकार सुषमा, सारिका, धर्मयुग कदाम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, बीसवीं सदी आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लैला मजनूं के किस्सों की गौरवगाथाओं का बखान करने वाली ग़ज़लों में कौन-सा सामाजिक दायित्व टटोलेंगे।.... इमली को आम बताकर इमली का स्वाद आम की तरह चखने बाले रचनाकारों को पता नहीं यह बात कब समझ में आयेगी कि मदिरा से भरे हुए प्याले को जाम कहा जाता है, जहर से भरे हुए प्याले को नहीं।... हमें स्वतंत्रता आन्दोलन के अगुआ भगत सिंह-चन्द्रशेखर आजाद और गांधी-गोखले, कोठे पर बैठने वाली चम्पाबाई और अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली रानी लक्ष्मी बाई, एक शासक के रूप में सम्राट अशोक और हिटलर में कुछ तो अंतर करना ही पड़ेगा।“
तेवरी और ग़ज़ल के बीच इसी तरह अन्तर को स्पष्ट करते हुए श्री अरुण लहरी लिखते हैं-‘‘तेवरी शांत जल के ऊपर विहार करते हुए हंसों के सौंन्दर्य को नहीं निहारती बल्कि बहेलिये के तीर से घायल हंस की आंखों में छुपी हुई वेदना के टटोलती है। तेवरी नारी को साकी के रूप में प्रस्तुत नहीं करती बल्कि स्वार्थी समाज द्वारा उत्पीडि़त शोषित नारी की पीड़ा को अभिव्यक्ति का विषय बनाती है | तेवरी गुलाबी होठों का रसपान नहीं बल्कि दवा के अभाव में दम तो तोड़ते हुए खुश्क होठों का भान है।’’
तेवरी और ग़ज़ल सम्बन्धी उपरोक्त विवेचन तेवरी को ग़ज़ल से जिन अर्थों में पृथक करता है, वह अर्थ निश्चित रूप से तेवरी और ग़ज़ल की वे चारित्रिक विशेषताएँ हैं, जिनका सीधा-सीधा सम्बन्ध किसी विधा के कन्टैन्ट अर्थात् उसके कथ्य से होता है। इस संदर्भ में तेवरी और ग़ज़ल के बीच का यह अन्तर बेहद सारगर्भित और सार्थक ठहरता है।
अस्तु अधिकांश गजलगोओं का यह कहना कि समय परिवर्तन के साथ ग़ज़ल के मिजाज में परिवर्तन आया है, यह सोचने को मजबूर करता है कि ग़ज़ल के मिजाज में क्या और कैसा परिवर्तन  आया है? श्री विजयपाल सिंह द्वारा सही समय पर उठाया गया यह एक ऐसा सवाल है जिसका ग़ज़लगोओं द्वारा उत्तर दिया जाना अभी शेष है।
श्री शिवओम अम्बर के अनुसार-“ ग़ज़ल किसी शोख नाजनीन की हथेली पर अंकित मेंहदी की दन्तकथा नहीं बल्कि आक्रोश की मुठ्ठी में थमी प्रलयकारी मशाल है।“
तब क्या विशेष कथ्य या चरित्र के आधार पर अपनायी गई एक विधा एक ही समय विशेष परिस्थिति विशेष, घटनाक्रम विशेष में अपने दो तरह के चरित्रों में जी सकती है? दुर्भाग्यवश ग़ज़ल के पक्षधरों के पास इसका भीं उत्तर नहीं। ऐसे में श्री विजयपाल सिह का यह तर्क बड़ा ही महत्वपूर्ण लगता है-‘‘ किसी रचना के कथ्य या शिल्प में जब क्रांतिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है तो वह अपनी मौलिक पहचान खोती है अथवा नहीं? यदि वह अपनी मौलिक पहचान खोकर, अपने पुराने रूप को त्याग कर एकदम नये रूप में प्रस्तुत होती है तो उसे पुराने नाम से ही पुकारना नितान्त नासमझी है। और यह नासमझी ठीक इस तरह है जैसे कोई वैश्या, वैश्यावृत्ति त्यागकर अपना घर बसा ले और एक आदर्श पत्नी की भूमिका निभाये लेकिन हम उसे फिर भी वैश्या ही सम्बोधित करते हैं।’’
दरअसल किसी रचना का कथ्य या चरित्र उस समय की परिस्थितियों और आस-पास के परिवेश के प्रभाव से उत्पन्न विचारों और भावों का मिश्रण होता है। सामंती युग की कविता भी उससे मुक्त नहीं रही, जब अय्याशी खून बनकर रगों में दौड़ रही थी, उस वक्त कविता सामाजिक चेतना की मशाल नहीं, एक अय्याश की बदनसीब लौड़ी थी। अन्त्यानुप्रास से बंधी यह कविता, मरमरी जिस्म, मख्मूर आंखों, खमदार जुल्फों एवं मस्त अंगड़ाईयों से भरा एक ऐसा पिटारा थी, जिसे यथानाम तथागुण के कारण ग़ज़ल संज्ञा से विभूषित किया गया। ग़ज़ल का चरित्र उस वक्त के प्रभाव से उत्पन्न विचार थे। फिर हुस्न की शिकायत महबूबा से न होकर व्यवस्था से होने लगी। आंखें खुमारी से नहीं, आक्रोश से जलने लगीं। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि हमने इस ओजपूर्ण अभिव्यक्ति को प्रेमिका को बांहों में भरने के जोश के रूप में ही आंका। ग़ज़ल शब्द संस्कार के रूप में ज्यों की त्यों हमारी मानसिकता से चिपका रहा। कुछ सजग  साहित्यकारों ने इस अन्तर को महसूस करते हुए, साहित्य की इस ओजपूर्ण अभिव्यक्ति को तेवरी नाम दिया।
तेवरी की यह स्थापना निर्विवाद और प्रासंगिक रहनी चाहिए थी। लेकिन ग़ज़ल शब्द के संस्कारों से चिपके साहित्यकारों ने तेवरी को जिस प्रकार संदिग्ध अवस्था में लाकर खड़ा करने की कोशिश की, उसमें एक संदिग्ध स्थिति तेवरी के शिल्पपक्ष को लेकर भी थी। जिसको साफ किये बगैर तेवरी की स्थापना बेमानी-सी लगने लगी। परिणाम स्वरूप श्री रमेशराज ने तेवरी के शिल्प पर भी तेवरीपक्ष के कई अंकों में चर्चा की।
ग़ज़ल के शिल्प से तेवरी के शिल्प की अलग करते हुए श्री रमेशराज ने ‘तेवरीः शिल्पगत विशेषताएं’ शीर्षक से एक लेख लिखा और कहा-शिल्प का अर्थ होता है किसी भी रचना को प्रस्तुत करने का माध्यम | रचना को प्रस्तुत करने की यह प्रक्रिया उस रचना की भाषा छंद, अलंकार, रस, शब्द प्रयोग, प्रतीक मिथक उपमान आदि विषय वस्तुओं पर पूर्ण रूपेण निर्भर रहती है।... तेवरी की रचना हिन्दी काव्य छन्दों के अनुसार की जाती है। जिसमें प्रयुक्त भाषा अलंकार प्रतीक उपमान मुहावरे आदि ग़ज़ल की भाषा या अलंकारिक व्यवस्था से कोई साम्य नहीं रखते। एक तरफ जहां ग़ज़ल में साकी, शराब मयखाना, वस्ल, यास, तमन्ना, तन्हाई, फिराक महबूबा, नामावर, जाहिर, मख्मूर आंखें, सुरुर, कमसिनी आदि शब्द अपने अभिधात्मक लक्षणात्मक या व्यंजनात्मक रूप में केवल रुमानी या रोमांसवादी दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द भटकाते हैं। वहीं तेवरी आम आदमी की भाषा के साथ एकाकार होकर सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। तेवरी में प्रयुक्त बिच्छू, सांप, शैतान, मछली, काठ के घोड़े, टोपी, बहेलिया, भेडि़या, चाकू, वर्दी, कुर्सी, गुलेल, बाज, चीता आदि शब्द अपने प्रतीकात्मक रूप में आदमी के शोषक और शोषित व्यक्तित्व को उजागर करते हैं ।“
श्री रमेशराज की तवेरी के शिल्प-पक्ष के संदर्भ में की गयी उक्त व्याख्या काफी सारगर्भित महसूस होती है | सच बात तो यह है कि जब किसी रचना का कथ्य बदलता है तो उस रचना के शिल्प में भी आमूल परिवर्तन आ जाता है। उसकी रस व्यवस्था बदल जाती। भाषा में एकदम नयी प्रतीकात्मक, अलंकारात्मक व्यवस्था खड़ी हो जाती है। इस नाते तेवरी का शिल्प, ग़ज़ल के शिल्प से एकदम विपरीत ही नहीं, बिलकुल अलग-थलग है। जहां तक छन्द का संबन्ध है तो तेवरी की रचना वर्णिक एवं मात्रिक छन्दों के आधार पर की जाती हैं जबकि ग़ज़ल की रचना बहरों पर आधारित होती है।
रही बात तेवरी में रदीफ- काफिये जैसी तुकांत व्यवस्था के सम्बन्ध में तो इस विषय में स्थिति स्पष्ट करते हुए श्री विजय पाल सिंह अपने शोध प्रबन्ध ‘‘ हिन्दी ग़ज़ल : परम्परा एवं विकास’’ में लिखते हें कि हिन्दी में ग़ज़ल के शेरों एवं रदीफ-काफियों जैसी व्यवस्था ग़ज़ल से ली गई प्रतीत नहीं होती। इस तरह की व्यवस्था तो जगनिक, चन्द्रवरदाई, विद्यापति जैसे आदिकाल के हिन्दी कवियों में भी उपलब्ध होती है। हिन्दी काव्य का रीतिकाल इस तरह की तुकान्त एवं शेरों जैसी व्यवस्था से भरा पड़ा है। अतः तेवरी में अपनायी गई उक्त प्रकार की व्यवस्था ग़ज़ल की नकल महसूस नहीं होती।

कुल मिलाकर तेवरी और ग़ज़ल सम्बन्धी उक्त विवेचन के आधार पर यह बात बल-पूर्वक कही जा सकती है कि हिन्दी काव्य में तेवरी की सार्थकता निर्विवाद है। तेवरी का कथ्य एवं शिल्प उसकी मौलिक उपज है, जिसमें हिन्दीपन की सौंधी-सौंधी गन्ध का अनुभव होता है।

Friday, March 18, 2016

तेवरीः युवा आक्रोश की तीसरी आँख +डॉ . रवीन्द्र ‘भ्रमर’

तेवरीः युवा आक्रोश की तीसरी आँख 

+डॉ . रवीन्द्र ‘भ्रमर’
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    ‘तेवरी’ के प्रति मेरा ध्यान निरन्तर आकर्षित होता रहा है और आज की हिन्दी कविता के सन्दर्भ में, मैं इसे एक सार्थक एवं साहसी कदम कहना चाहता हूँ। एक काव्य-विधा के रूप में ‘तेवरी’ का ताना-बाना अलीगढ़ में तैयार हो रहा है, लेकिन इसी काव्य-सर्जना के पैटर्न अन्य स्थानों पर भी बुने गये हैं या बुने जाने लगे हैं। इसे मैं ‘तेवरी’ में निहित कथ्य की चिन्गारी और शिल्प की आँच के प्रयास रूप में देखता हूँ।
मेरे शहर में युवा आक्रोश के कवि रमेशराज, अरुण लहरी, योगेन्द्र शर्मा और सुरेश त्रस्त ने ‘जनजागरण’ की विचार-प्रधान ‘तेवरी-पक्ष’ का सम्पादन प्रारम्भ किया। इसके आँकड़ों में प्रकाशित सामग्री को मैं देखता रहा हूँ। श्री रमेशराज द्वारा सम्पादित ‘तेवरी’ कवियों के कुछ समवेत संकलन भी मुझे देखने को मिले। ‘तेवरी’ के विस्फोटक कथ्य और आक्रोशपूर्ण मुद्रा का जो सटीक परिचय कराते हैं, इन संकलनों के नाम हैं- 1. ‘अभी जुबां कटी नहीं’, 2. ‘कबीर जि़ंदा है’, 3. ‘इतिहास घायल है’। इन संकलनों में लगभग ढाई दर्जन कवियों की तेज-तर्रार और धारदार रचनाएँ संकलित हैं।
तेवरी-कवि श्री दर्शन बेज़ार की रचनाओं का एक स्वतन्त्र-सम्पूर्ण संकलन प्रकाशित हुआ है-‘एक प्रहारः लगातार’। काव्य-संग्रह का यह नाम भी तेवरी कवियों की युयुत्स मनःस्थिति और तेवरी विधा के बोध-पक्ष को उजागर करता है। श्री बेज़ार से कई कारणों से मेरा कुछ गहरा परिचय है। उनके इस काव्य-संग्रह को मैंने बहुत ध्यान से और किंचित् आत्मीयता के साथ पढ़ा। ‘तेवरी’ के प्रति मेरी अनुशंसा और आस्था का प्रसंग यहीं से शुरू होता है।
कुछ समय पूर्व, अलीगढ़ के बुद्धिजीवीवर्ग के बीच आयोजित श्री बेज़ार की काव्यकृति ‘एक प्रहारः लगातार’ के विमोचन-समारोह की अध्यक्षता का भार मुझे सौंपा गया।  इसके लिये ‘सार्थक-सृजन प्रकाशन’ के नियामक और ‘तेवरी’ के सूत्रधार श्री रमेशराज का मैं विशेष आभारी हूँ। उक्त अवसर पर मैंने ‘तेवरी’ को ‘युवावर्ग की तीसरी आँख’ की संज्ञा दी थी।
पुराण-पुरुष शिव की तीसरी आँख जब खुलती है तो किसी ज्वालामुखी की भांति तप्त लावा उगलती है और पाप का प्रत्यूह तथा कामाचार का अवरोध जलकर राख हो जाता है। ध्यान-मग्न शिव की समाधि  बड़ी मुश्किल से टूटती है लेकिन जब कभी ऐसा होता है तो कोहराम मच जाता है-कृत्रिम वसन्त में  आग लग जाती है। तेवरी के शब्द-संधान को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वर्तमान सामाजिक विसंगतियों और सामाजिक विद्रूपताओं में आग लगाने के लिये युवा-आक्रोश की तीसरी आँख खुल गई है।
विश्व-वाड्.मय का इतिहास साक्षी है कि कविता से फूल और त्रिशूल दोनों का काम लिया गया है। सामाजिक क्रान्ति के सन्दर्भ में कवि की कलम हरसिंगार की टहनी में तलवार उगा लेती है। आज के सामाजिक जीवन में जो अन्याय, उत्पीड़न और शोषण की विभीषिका है, उसी के समानान्तर युवा कवियों की कलम अन्याय की शृंखला को काटने के लिए अत्याचार और शोषण के पूँजीवादी प्रपंच को जलाने के लिये तेवरी  के  माध्यम से बारूदी भूमिका तलाश कर रही है।
अन्याय की शृंखला को काटने के लिए अत्याचार और शोषण के पूँजीवादी प्रपंच को जलाने के लिये‘तेवरी’ के तेवर इसी पृष्ठभूमि में ध्यातव्य हैं-
1.   अब हंगामा मचा लेखनी,
कोई करतब दिखा लेखनी।
मैं सूरज हूँ इन्कलाब का,
मेरा इतना पता लेखनी।
[रमेशराजःअभी जुबां कटी नहीं]
अब कलम तलवार होने दीजिए,
दर्द को अंगार होने दीजिये।
2.घायल है इतिहास समय के वारों से,
चलो रचें साहित्य आज अंगारों से।
[दर्शन बेज़ार, एक प्रहारः लगातार]
‘तेवरी’ विधा  रोमानी ग़ज़ल का युयुत्सावादी हिन्दी रूपान्तर मात्र नहीं है। समकालीन कविता में ग़ज़ल का प्रचार खूब हुआ है और तेवरी के कवि भी ग़ज़ल के पैटर्न के प्रति भले ही आकर्षित दिखाई पड़ते हैं किन्तु इनकी रचनाओं में हिन्दी-छन्दों का प्रयोग विशेष दृष्टव्य है। आल्हा के लोकछन्द में बुनी गई एक सफल रचना इस प्रकार है-
हाथ जोड़कर महाजनों के पास खड़ा है होरीराम।
ऋण की अपने मन में लेकर आस खड़ा है होरीराम।।
 [सुरेश त्रस्त, कबीर जि़न्दा है]
दोहा छन्द में तेवरी का एक प्रयोग देखिये-
रोजी-रोटी दे हमें या तो यह सरकार।
वर्ना हम हो जाएंगे गुस्सैले खूंख्वार।।
[रमेशराज, कबीर जिन्दा है]
    ‘तेवरी’ की रचनाओं में पुराने छन्दों के अभिनव प्रयोग के साथ जनभाषा की मुखरता और संप्रेषण की सहजता एक विशिष्ट आयाम को उभारती है। अब कविता में जन-भाषा की शब्दावली और मुहावरों का प्रयोग बहुत जरूरी है।

कविता यदि क्रान्ति का औजार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है तो उसमें सीधा  और सटीक संप्रेषण होना चाहिए। सातवें दशक में अलीगढ़ से अखिल भारतीय स्तर पर ‘सहज कविता’ का अभियान चलाते हुए मैंने अनुभूति का सार्थकता और अभिव्यक्ति की सहजता पर विशेष बल दिया था। मुझे खुशी है कि नवें दशक में ‘तेवरी’ ने इस ऐतिहासिक दायित्व को ग्रहण करने की सूझबूझ दिखाई है। समकालीन हिन्दी कविता में इसके भविष्य के प्रति मैं आशान्वित हूँ।

ग़ज़ल को ‘तेवरी’ ही क्यों कहना चाहते हैं ? डॉ . सुधेश

ग़ज़ल को ‘तेवरी’ ही क्यों कहना चाहते हैं ? 

डॉ . सुधेश 
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    आप ग़ज़ल को ‘तेवरी’ ही क्यों कहना चाहते हैं? ग़ज़ल जैसे लोकप्रिय शब्द के होते तेवरी, गीतिका, ग़ज़लिका जैसे शब्दों को चलाने की क्या आवश्यकता है? नीरज ने गीतिका शब्द चलाने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए। ऋषभदेव शर्मा ने भी तेवरी शब्द का समर्थन किया था, पर बाद में मौन धारण कर लिया। यदि नया तेवर दिखाने का आग्रह है तो प्रत्येक सफल कविता में होता है। यदि नये तेवर की कविता तेवरी है तो उसका रूप ग़ज़ल की शैली का सहारा क्यों लेता है?
    अब आपके संपादकीय पर कुछ साफ बातें- आप मात्रिक छन्द में लिखित ग़जल के समर्थन की कोशिश में मात्रा गिराना अर्थात दीर्घ स्वर को हृस्व स्वर के रूप में पढ़ने और लिखने की कोशिश के आलोचक हैं। आपके तर्क सही हैं। मात्रा गिराना उर्दू ग़ज़लों में आम है। पर उर्दू ग़ज़ल में उसे मान्यता प्राप्त है। तब हिन्दी कवि यदि अपनी ग़ज़ल में वृद्धि-ढंग अपनाये, तो उसे आप दोष क्यों मानते हैं? श्री आर.पी. शर्मा महर्षि की पुस्तक मैंने नहीं देखी, पर आप द्वारा उन पर की गई आलोचना पढ़कर मुझे लगता है कि शर्माजी मात्रा गिराने की कोशिश के समर्थन में अति तक चले गए। मात्रा गिराने की कोशिश यदि मौखिक स्तर तक रहे तो अर्थ-बोध बाधित  नहीं होता, पर जब उसे लिखित रूप में उतारा जाए तो वह बेहूदा कोशिश हो जाती है। एक बात और हिन्दी में केवल मात्रिक छन्द नहीं है, अतः आपका कथन दोषपूर्ण है। दूसरे शब्दों में यह कि यह आग्रह उचित नहीं है कि हिन्दी ग़ज़ल केवल मात्रिक छन्द में लिखी जाए तो क्या वर्णिक छन्द विधा  केवल पुस्तक में परिगणित होने के लिए है?


‘तेवर’ का शाब्दिक अर्थ है-‘क्रोध् भरी चितवन’ डॉ. विशनकुमार शर्मा

‘तेवर’ का शाब्दिक अर्थ है-‘क्रोध-भरी चितवन’ 

डॉ. विशनकुमार शर्मा
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    श्री रमेशराज ने कविता के क्षेत्र में एक विशेष प्रवृत्ति को लेकर कविता-सृजन करना आरम्भ किया है और उसका नाम रखा है-‘तेवरी’। वे ‘तेवरी’ को विधा कहते हैं-‘‘सामाजिक, राजनीतिक विकृतियों के प्रति तिलमिलाते तेवरों के आधार पर हमने तेवरी को काव्य की एक विधा के रूप में स्वीकारा है।’’ ;तेवरीपक्ष-1, पृ.1
 ‘तेवर’ का शाब्दिक अर्थ है-‘क्रोध् भरी चितवन’, काव्य के साथ इसका अर्थ-‘क्रोध् या विद्रोह भरी कथन-भंगिमा माना जा सकता है। श्री रमेशराज के खेमे के कवियों के ‘तेवरी’ काव्य को पढ़ने से यह अवश्य लगता है कि उसमें सामाजिक और विशेष रूप से राजनीतिक विकृतियों के प्रति विद्रोह की भावना की प्रतिष्ठापना ही अधिक है। कुछ कवियों की इसी विद्रोह की अभिव्यक्ति ग़ज़ल की शैली में भी हुई है।
कुछ लोग ग़ज़ल की धारा को केवल प्रेम-शृंगार से जोड़ते हैं । प्रमुखतः ‘‘ग़ज़ल के मूल में ग़ज़ाल [हिरन का बच्चा] शब्द है। ग़ज़ल उस कराह को कहते हैं, जिसे एक ग़ज़ाल [हिरन का बच्चा] शिकारी का तीर लगने पर अपनी बेबसी में निकालता है। इसलिये ग़ज़ल नामक काव्य-रूप में दुनिया की नापायदारी और दर्दमंदी का जिक्र किया जाता है। इस तरह ग़ज़ल में मूलतः करुणा, शृंगार और शान्तरसों की प्रधानता रहनी चाहिए। हिन्दी की आधुनिक ग़ज़लों में शान्तरस की बात अधिक  है। कतिपय ग़ज़लगो शान्ति के माध्यम से समाज और राजनीति की विकृतियों का पर्दाफाश आज भी कर रहे हैं।’’ उक्त कथन के माध्यम से मैं यह तो नहीं कहना चाहता कि ‘तेवरी’ वास्तव में ग़ज़ल है? नहीं, उसमें ग़ज़ल की शैली आंशिक ही उतारी अवश्य गयी है। 
तेवरी का उद्भव एक ऐसे समाज की देन है, जिसे विशेष रूप से राजनेताओं ने सताया है। जैसे-कोई स्वतंत्र सिंहों की वनस्थली में मदमस्त हाथी अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहे। लोकतंत्र का प्रत्येक मानव स्वतंत्र सिंह है और नेता मदमस्त हाथी। उसका प्रभुत्व तभी तक है, जब तक कि चुनाव का चपेटा लोकतंत्र के मानव रूपी सिंहों के द्वारा मदमस्त हाथी के कानों पर नहीं पड़ता। ‘तेवरी के कवि’ इस ‘चपेटे’ को नेता के कानों पर बुरी तरह से पड़वाने की तैयारी कर रहे हैं। एक प्रकार से तेवरी का सबसे प्रबल पक्ष शोषकवर्ग पर कुठाराघात करना ही है। यद्यपि अन्य कुछ सामाजिक पक्ष भी ‘तेवरी’ के अपने मूल मुद्दे हैं। हिंसा, बलात्कार, मुनाफाखोरी भी इसकी विशिष्ट प्रवृत्ति को प्रकट करते हैं। और इन सबके मूल में हैवानियत को खरीदने वाला वह नेता ही है।
सच्चा काव्य या साहित्य हमारे समाज का, हमारी राजनीति का और हमारी प्रशासन-पद्धति का वास्तविक शब्द-बिम्ब खड़ा करता है। जिस देश की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक प्रपंच और प्रशासनिक चालें जैसे होंगे, साहित्य उनका वैसा ही रूप प्रस्तुत करेगा। आज हमारा समाज, हमारी राजनीति आदि जैसे बन गये हैं, उसे आज के स्वतंत्र साहित्यकार के द्वारा ठीक उसी रूप में चित्रित किया जा रहा है। गत वर्षों से कवि सम्मेलन-मंचों से लेकर लिखित काव्यकृतियों में हमको एक ही पीड़ा, एक ही घुटन सुनने को मिल रही है, वह पीड़ा या घुटन है-सामाजिक और विशेष रूप से राजनीतिक विकृतियों से सताये गये व्यक्ति की।
किसी पाश्चात्य साहित्यकार ने कहा था कि साहित्य समाज का दर्पण है। वास्तव में आज का साहित्य विशेष रूप से ‘तेवरी’ साहित्य आज के समाज का दर्पण है। उसमें आज के मुखौटेबाज समाज के चेहरों को साफ-साफ देखा जा सकता है। साहित्य की उपयोगिता के संदर्भ में मूल बात ध्यान देने की यह है कि साहित्यकार के द्वारा जो रचना, काव्य-उपन्यास-कहानी-नाटक आदि के नाम से समाज को दी जा रही है, उसमें हमें देखना है कि मनुष्य को पशु-सुलभ धरातल से उठाकर उदात्त रास्ते पर ले जाने की क्षमता है या नहीं। यदि ऐसी क्षमता उसमें है तो वह साहित्यिक कृति है। यदि ऐसी क्षमता उसमें नहीं है तो वह कोरा वाग्जाल है, वह निरर्थक है। उसे हम साहित्यक कृति कभी नहीं कह सकते। वास्तव में ‘तेवरी’ की कविताओं में कुछ-कुछ यह शक्ति निहित है कि वह विकृत समाज और विकृत राजनीति को ठीक कर सकेगी। बात को कहने की उसमें तीखी व्यंजना-शक्ति भी निहित है।


ग़ज़ल ने रंगीनियों में श्रीवृद्धि की है

 ग़ज़ल ने रंगीनियों में श्रीवृद्धि की है 
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तेवरी आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर परोक्ष स्पष्टता की शर्त होना आवश्यक है। हमें सैद्धान्तिक तौर पर इस बात को स्वीकारने में कतई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि आन्दोलनों से साहित्य समृद्ध होता है और उसके विकास को गति मिलती है। वैचारिक मतभेद और विरोध के वातावरण में रचनाशीलता को एक नया निखार हासिल होता है। साहित्य गतिरोध और जड़ता को तोड़कर जि़न्दगी के और करीब आता दिखायी देता है। लेकिन यह आन्दोलनों का केवल एक पक्ष है और ऐसा तभी मुमकिन होता है जब किसी आन्दोलन के आधारभूत वैचारिक आग्रह बहुत स्पष्ट हों और उस वैचारिकता के रचनात्मक प्रतिफलन की दृष्टि से भी वह एक सुदृढ़ आधार पर खड़ा हो। अतः जरूरी है कि वैचारिक ग्राह्यता और रचनाशीलता के प्रति तेवरीकारों को काफी सजग रहना होगा।
तेवरी की पृष्ठभूमि को भाई रमेशराज स्पष्ट करते हुए अपना मत जिस प्रकार प्रकट करते हैं, उससे यह तो आभास हो जाता है कि तेवरी का वैचारिक आग्रह बहुत कुछ युवावर्ग से ही सम्बन्धित है। उग्रता, तत्परता, निरंतरता, नकारने की दृढ़ता, कुंठा को काट फैंकने की कोशिश का प्रतिफलन ही तेवरी है। समसामायिक वातावरण की आवश्यकता के साथ ही साथ परिस्थितियों को उभारने में तेवरी का लक्ष्य बेधित रहा है। खासकर राजनीतिपरक दुर्गंधता । इस वैचारिक आग्रह के साथ ग़ज़ल होने के खतरे हैं, जो चुनौती स्वरूप खड़े हो सकते हैं।
    आशा गुप्ता का मानना है-‘शिल्प के स्तर पर आयी साम्यता विवादास्पद नहीं है किन्तु यदि वैचारिक स्तर पर तुलना की जाए तो समकालीन ग़ज़ल और तेवरी में बहुत कुछ साम्यता है। परिवेश को स्वीकारने में आज ग़ज़ल भी सामर्थ्यवान है किन्तु तेवरी से उसकी वही भिन्नता है जो एक कहानी और सत्यकथा [अपराध् कथा] में है। कहानी का वैचारिक परिवेश और अपराध कथा का वैचारिक परिवेश जितना भिन्न है, उतना ही ग़ज़ल और तेवरी का।
ग़ज़ल के मुकाबले तेवरी के लिये एक सीमा काम करती है। तेवरी ग़ज़ल में घुस सकती है, किंतु ग़ज़ल का तेवरी में घुसना अतिकमण होगा जो नकारात्मक होगा। यही वजह है कि तेवरी में सब कुछ होते हुए भी आक्रोशजनित वैचारिक आग्रह है, जबकि ग़ज़ल में इस तरह की शर्ते जरूरी नहीं है। अपने जन्मकाल से ग़ज़ल ने रंगीनियों में श्रीवृद्धि की है। इस हेतु ग़ज़ल, तेवरी के एकदम निकट होते हुए भी बहुत दूर है, अंतरंगता के नाते से।’
    डॉ. हरिमोहन कहते हैं-‘तेवरी नाम की सार्थकता विवादास्पद है। ‘अगजल’ भी ऐसा ही तथाकथित आंदोलन था.. हिन्दी कविता भी तो प्रारम्भ से ही दरबार की चीज रही है। क्या कविता को दरबार की चीज मानकर कुछ कहना होगा?’
    कविता को दरबार की चीज मानकर यही कहा जा सकता है कि तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिवेशगत परिस्थितियों का अवलोकन एक बार पुनः कर लिया जाये, क्योंकि लेखन का समकालीन संदर्भों को साथ रखकर ही मूल्यांकित/रेखांकित किया जाना श्रेयस्कर होता है। 
यदि आप यथार्थवाद से प्रभावित होने की अपेक्षा रखते हैं-लिखते हैं तो चौराहे पर हुए दंगे में एक-दो बार लाठियाँ झेलकर हो दंगे की भयावहता और आतंक की सार्थक अभिव्यक्ति अधिक सुशक्तता से कर सकते हैं। अपनी प्रेमिका के करीब बैठकर प्रेमप्रसंग करते हुए दंगे के लिए पृष्ठ रँगना यदि कोई सजग समीक्षक उचित ठहरा देता है तो तेवरी की अपेक्षा ग़ज़ल को अधिक सशक्त विधा मानने में मुझे कोई हिचक नहीं होगी।
कुल मिलाकर स्थिति यह हो जाती है कि विधा का महत्व रेखांकित करने के पूर्व विधा  के उपजने की मजबूरी को ओर ध्यान दें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय होगा कि भाई रमेशराज का तेवरी के लिए तत्कालीन कवियों जैसे तुलसी, बिहारी, घनानंद बगैरह-बगैरह को दोषी ठहराने का नजरिया उपयुक्त नहीं है। तेवरी का महत्व प्रतिपादित करते समय यह सोचना बहुत जरुरी है कि हमें इतिहास लिखना है, पुनरावृत्ति नहीं करनी है। दिल्ली प्रेस की भांति हिन्दी काव्य के आधार स्तम्भों का मखौल नहीं उड़ाना है। इस तरह के नजरिए साहित्य की विधाओं को कहीं नहीं ले जाते, वरन् पीछे धकेल लाते हैं और व्यर्थ ही अप्रिय विवादों के कठघरे में ला खड़ा करते हैं।
    साथ ही हम कदापि यह नहीं भूलें कि अपने सामाजिक, राजनीतिक विचारों और समूची मानसिकता को उसकी सार्थकता के सन्दर्भ में रेखांकित किए बिना किसी नये आंदोलन की अगुआई की महत्वाकांक्षा दुर्भाग्यपूर्ण ही समझी जानी चाहिये। वरना कुछ खतरे पैदा भी होते हैं। बहरहाल इस तरह के दौर से गुजरने के पहले यह जान लेना भी जरूरी है कि इसके पीछे कितनी सर्जनात्मक ऊर्जा हमें निरंतर देनी है, वरन् कुछ लोग इसी बहाने भी अपनी रोटी सेंककर खाते हुए बाजू से गुजर जायेंगे और हम फिर भूखे ही रह जाने के लिए मौजूद रह जायेंगे।
जो लोग हर आंदोलन के साथ हो लेने की सुविधाजनक स्थिति में होते हैं, वे वस्तुतः किसी के भी साथ नहीं होते, स्वयं अपने साथ भी नहीं। समय का एक बहुत छोटा-सा टुकड़ा भी इस बात को खूब अच्छी तरह स्पष्ट कर देता है कि ऐसे लोगों के साथ किस किस्म का सलूक होना चाहिये। तेवरी के पीछे भी साजिशों का उद्भव होगा, इसमें दो राय नहीं। किंतु इसके लिये स्वयं हमें तैयार होना होगा कि हम समय का एक बहुत छोटा-सा टुकड़ा भी इनके लिए अवश्य निकालें जो मधुरेश के अनुसार-‘अपने किस्म का सलूक करेगा’।
जो लोग अभी भी  संदेहास्पद बयान दे रहे हैं, उन पर क्या विश्वास किया जाये कि वे तेवरी के संक्रमण काल में तोड़ेंगे नहीं। वस्तुतः ऐसे किसी भी किस्म के निराशावादी दृष्टिकोण और उसके प्रेरकों को बाजू से गुजर जाने के लिए भी हमें एक गली सुरक्षित रखती होगी।
बहरहाल तेवरी को लेकर अपच्य कथ्य विवाद हमारे सामने न आएँ, ऐसे प्रयास होना चाहिये। किन्तु यदि आ भी जायें तो उसे हटा लेने की क्षमता हममें होनी चाहिए। इस जरा से अपच्य की खातिर हम अपने भरे पूरे पेट को लेकर किसी डाक्टर के पास जाएँ और पचवायें, इससे बेहतर है कि अपच्य को खुद ही नकारें, किन्तु शालीनता की सीमा में। 


तेवरी-आन्दोलन परिवर्तन की माँग +चरनसिंह ‘अमी’

तेवरी-आन्दोलन परिवर्तन की माँग 

+चरनसिंह ‘अमी’
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    परिवर्तन प्रक्रिया के लिए मुख्यतः तत्कालीन परिवेश, माँग, परम्परा, मूल्य, अधिक जिम्मेदार होते हैं। साहित्य के संदर्भ में कहें तो जब भी अभिव्यक्ति, समाजगत-आदमीगत नये आयाम तलाशती है, वह पिछला पूरी तरह खंडित तो नहीं करती किन्तु बहुत हद तक उसे स्वीकारने में हिचकिचाती जरूर है। यह निर्विवाद रूप से स्वीकार्य होना चाहिए कि अभिव्यक्ति इस प्रचलित रूप में संकुचित होती जा रही है, समुचित रूप से अपनी बात नहीं कह पा रही है। या यूँ कहें कि कब उसको नये अर्थ-संदर्भ या मूल्य को अभिव्यक्ति देने में वर्तमान प्रचलित रूप असमर्थ है। बहरहाल यहीं से परिवर्तन की माँग उठने लगती है, जो निरंतर तेवरी को स्थापना की ओर अग्रसर करती है।
ग़ज़ल का अपना एक कोण रहा है। वह दायरों में बँधी रहे, आवश्यक नहीं है। किसी भी विधा के लिए यह जरूरी शर्त भी है कि वह दायरा तोड़े। किन्तु ग़ज़ल को दायरे में बाँधकर रखा जाना ही श्रेयस्कर साबित नहीं हुआ। हालांकि उसकी छटपटाहट महसूस की जाती रही। प्रेमी-प्रेमिका को साँसों के दरम्यान टकराने वाली ग़ज़ल, प्रेमिका के जूड़े में गुलाब की तरह खुँसती रही। किन्तु जब वह वहीं उलझकर रह गयी तो उसे किसी ने भी बाहर निकालने की कोशिश नहीं की। ऐसे में गुलाब की जगह यदि ‘तेवरी’ ने आकर क्लिम्प खोंस दिया तो इसमें जूड़े की सुन्दरता घट तो गई? क्या जूड़े को और अधिक सुहढ़ता नहीं मिली? कभी-कभार यह पिन सिर के भागों में चुभ भी गयी तो यह क्षम्य होना चाहिए |
यदि तेवरी को अतिक्रमणकारी प्रवत्ति में देखे तो उसके सन्दर्भ में तमाम बातें वाजिब ठहरती हैं। तेवरी की इसी जुर्रतबाजी के कारण ही ग़ज़ल के कुछ हिमायतदार तेवरी को इतने सीधे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर इतनी क्षमता वे स्वयं मैं पैदा भी नहीं कर पाये हैं।
तेवरी के अपने निजी तेवर हैं, अपनी बौखलाहट है। आज बौखलाया-टूटा हुआ आदमी यदि अचानक मुँहफट हो जाए, मारने के लिए ईंट उठा ले, अधिकारों के लिए सीधे-सीधे गालीगलौज पर उतारू हो जाए और चीखे तो इसमें ग़ज़लकारों को तेवरीकारों को गरियाने की जरूरत क्या है? ग़ज़ल के हिमायती यह क्यों देखते हैं कि तेवरीकार क्या चिल्ला रहा है? वे यह क्यों नहीं देखते हैं कि वह क्यों चिल्ला रहा है? असल में बहस का मुद्दा भी यही दूसरी बात होनी चाहिए।
इसमें उलझने से हमें कुछ नहीं मिलेगा कि तेवरी विधा है या नहीं। यह स्थापित होगी या नहीं? परिभाषा और मुख्य आधार क्या हो? क्या तेवरी युगबोध को पूरी तटस्थता से देखेगी? ये मुद्दे बड़े हैं। इन पर तत्काल बहस करने की कतई आवश्यकता नहीं है। बहस तत्काल इस पर की जानी चाहिये कि तेवरी को हम इतना जरूरी क्यों महसूस कर रहे हैं? आज के संदर्भ में उसके लिए हम कितनी रचनात्मक ऊर्जा चुका रहे हैं?
बहरहाल तेवरी को सजग आन्दोलन का रूप दिया जाना नितांत अपेक्षित है। ‘तेवरीपक्ष’ निकालकर अलीगढ़ से श्री रमेशराज व उनके साथियों ने दुस्साहस किया है। एक कड़वा सच सामने है। तेवरी काफी देर से सामने आयी। खैर! देर आयद, दुरुस्त आयद!


भौतिकवाद के निकम्मेपन से तेवरी का उद्भव +राजकुमार ‘निजात’

भौतिकवाद के निकम्मेपन से तेवरी का उद्भव  

+राजकुमार ‘निजात’
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    तेवरी एक कविता है, मगर कविता तेवरी नहीं है। आज हिन्दी कविता जिस जगह, जिस स्थित में है, इसके अध्ययन के फलस्वरूप हमें ऐसा गौरव अनुभव नहीं होता, जैसा कि हमें होना चाहिए। कविता साहित्य की परिधि से निकलकर भौतिकवाद की ओर झुक गयी है। इसके लिये किसी प्रमाण की तह में जाने की आवश्कयता नहीं। भौतिकवाद से पनपे निकम्मेपन और सुविधापरस्ती ने हिन्दी कविता को दूषित कर दिया है। इस स्थिति ने जन्म दिया-तेवरी को। मगर तेवरी के उद्भव का यही मात्र कारण नहीं है।
तेवरी उन त्रासद स्थितियों की देन है जो समाज में भ्रष्ट आचरण, नैतिक पतन, कालाबाजारी व कुव्यवस्था आदि के रूप में व्याप्त है। यह आक्रोश की उग्रता गलत व्यक्तियों या वर्ग को साहित्यक भाषा में डाँटती ही नहीं, फटकारती भी है और आवेश में उनके मुखौटे तक नोंच डालती है।
पिछले कई वर्षों से कविता का तेवरी-आन्दोलन किसी न किसी मंच से मुखरित होता रहा है और तभी से यह प्रश्न उठते रहे हैं कि तेवरी, काव्यविधा ग़ज़ल का ही एक रूप है। इस भ्रान्ति को व्यावहारिक रूप से हल करने के लिये अनेक प्रकाशन सामने आये है। डॉ. देवराज व देवराज की पुस्तक ‘तेवरी’ की भूमिका में तेवरी को जिन सारगर्भित शब्दों में परिभाषित किया गया है, अर्थपूर्ण है।
चूंकि ग़ज़ल विगत दो तीन दशकों से जन-जन की जिस प्रकार चहेती बनी, उसे तेवरी प्रणेताओं को तेवरान ढँग से खारिज करने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प न था। यूँ तो तेवरी को मूर्त रूप में आने से पूर्व भी पंडित रामप्रसाद ‘बिम्सिल’, अशपफाक उल्ला खां, साहिर, कैफी आजमी, फैज आदि अपने राष्ट्रवादी चिन्तन को ग़ज़ल रूप में कहा, किन्तु इससे ग़ज़ल अपना अर्थ खोती चली गई। अतः यह महसूस किया जाने लगा कि आक्रोश की इस साहित्यिक जुबान की अपनी ही एक विधा की जरूरत है, जो अपने नाम के अनुरूप हो। ‘तेवरी’ शब्द ने इस आक्रोशमय अभिव्यक्ति को शीर्षक रूप में हल करते हुए सार्थक कर दिया।
आज काव्य की दूसरी विधाएँ जिस पथ से गुजर रही हैं, ऐसा लगने लगा है कि आधुनिक समाज कविता नाम से उकता गया है। एक तो फूहड़ हास्य-व्यंग्य ने कविता को इतना भ्रमित कर दिया है कि कुछ कालीदासी [कालीदास नहीं] लोग हास्य कविता को ही कविता मानने लगे हैं। ऐसा यहाँ [सिरसा] हुआ भी। एक बार कवि सम्मेलन में हँसने-हँसाने को ही कविता कह डाला। साहित्य के लिये निस्संदेह यह भावना-स्वप्न खतरनाक है।
कविता की अन्य विधाएँ इस अर्थप्रधान युग में अपने सार्थक मूल्य खो रही हैं  तो चिन्ता का विषय बनना स्वाभाविक ही है। तेवरी विधा कविता की एक मशाल लेकर जब से अवतरित हुई है, लोगों ने-समाज ने एक बार पुनः पुस्तक के पन्ने पलटने शुरू कर दिये हैं, क्योंकि कविता-साहित्य में अब तेवरी ही मात्र ऐसी विधा रह गयी है, जो ग़ज़ल के समान्तर चल सकती है और कवि के क्षोभ, कुंठा, विद्रूपता, संत्रास, आक्रोश, दमन, उत्पीड़न, हताशा, असंतोष व विद्रोह को सही अभिव्यक्ति दे सकती है। युवा कवि वर्ग [हृदय से युवा] जब सामाजिक विक्षिप्तावस्था का वर्णन करता है तो दिशा-देश सम्बन्धी ऐसे प्रश्न भी सामने आ जाते हैं, जिनसे सिद्धान्तहीन, भ्रष्ट समाज को उन्हीं की भाषा में झँकझोरा जा सके, लेकिन सभ्य भाषा का परित्याग न कर बैठे।
तेवरी गाली नहीं देती, शब्द-वाण चलाती है, उस समाज पर जो कानून और अधिकारों का अनाधिकृत  रूप से प्रयोग करते है। जन-भावना को ठेस पहुँचाते हैं। राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए संविधान के विपरीत जाते हैं। तेवरी उनके खिलाफ पैने हथियार का काम करती है। ‘देवराज’ की भी यह मान्यता है कि ‘नयी परिस्थितियों में कविता में नया व सार्थक परिवर्तन आना चाहिए। तेवरी इस सार्थक परिवर्तन का ठोस आधार है’।
तेवरी शब्द के अन्तर्गत जिन व्याख्याओं की अभिव्यक्ति की गयी है, यह व्याख्या इसकी पृष्ठभूमि से की गई है। स्वयं तेवरी शब्द अपने वक्तव्य को इतने विस्तृत रूप से सार्थक नहीं करता। मगर यह मानने में संकोच नहीं है कि तेवरी-शब्द भावना से जुड़ा है। यह साहित्यिक आन्दोलन एक शोषण मुक्त समाज की संरचना को न केवल अपने अन्तर्मन की पीड़ा में अनुभव ही कर रहा है, बल्कि ऐसे समाज की कल्पना की प्रयोजना से, मौलिक भाव से आबद्ध भी है। मैं समझता हूँ समाज-विरोधी  तत्त्वों को मूल रूप से नष्ट करने में यह आन्दोलन व्यावहारिकता के शिष्ट दृष्टिकोण की वैधानिकता लेकर चले। अभी यह आन्दोलन जन-जन के आक्रोश का कंधा नहीं बन पाया है।
तेवरी को  एक लम्बे पथ से गुजरने की प्रतीक्षा है। अतः यह कहना समयपूर्व है कि प्रत्येक शोषित एवम् सही व्यक्ति की आवाज को इसका वरदहस्त मिल चुका है। मैं समझता हूँ, तेवरी को आखिर ‘मानवतावाद’ से तो जुड़ना ही चाहिए। ‘वाद’ से अभिप्राय यहाँ स्पष्ट है, तेवरी के क्रान्तिकारी विचारों को प्रत्येक तेवरीकार, तेवरी समर्थक, बलपूर्वक एक आवश्यकता मानता है। वर्तमान व्यवस्था का परिवर्तित स्वरूप हमें ठीक वैसे ही तय करना होगा जैसी तेवरी की व्याख्या तय है।

तेवरी का शिल्प, ग़ज़ल का शिल्प ही माना जाना चाहिए। बेशक यह सत्य है कि इस शिल्प की विषय सामग्री मौलिक है। उपरोक्त भावों से, जो कि परिचर्चा के प्रारूप के अन्तर्गत प्रदर्शित किये गये हैं, मैं बेवाक कह रहा हूँ कि तेवरी का यह भावात्मक आन्दोलन, आक्रोश की परिधि  को तोड़कर, अशिष्ट व भद्दी भाषा के गूढ़ प्रयोग के बीच उन्माद की स्थिति धरण न कर ले। हमें सभ्य रहकर ही अपनी अभिव्यक्ति करनी चाहिए। तभी एक सभ्य समाज की रचना को सार्थक कर सकेंगे।